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परिचयामृत
Parichayāmṛt
Śrī Charaṇāśrit — "Mahendra Bābā" (Mahendra Maharaj)

01
श्रीमन्मुनीन्द्र सूक्त
02
नम्र निवेदन
श्री 108 श्री महेन्द्र बाबा मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा बहुत छोटी सी अवधि में कई पुस्तकों का प्रकाशन कर परम पूज्य गुरुदेव श्री 108 श्री महेन्द्र बाबा के विचारों, नियमों और लेखों का जो प्रचार प्रसार किया जा रहा है, एक सार्थक कदम हैं ।
गुरु पूर्णिमा जुलाई 2003 में पूज्य चरणाश्रित देव के चार लेखों का ''परिचयामृत'' के रूप में प्रकाशन एक जनकल्याणकारी कार्य हैं । जिसमें परम पूज्य योगीराज लाहिडी महाशय और पूज्य श्री सोमवारी बाबा के विषय में लिखे महेन्द्र बाबा के विचार इस के माध्यम से जन-जन तक पहुचेंगे ।
भारतवर्ष की भूमि बडी धन्य-धन्य है जहाँ अनेकों वर्षों से भगवान् श्रीराम से लेकर भगवान् श्री कृष्ण तक अवतार लेकर आये है, तो अनेक बड़े-बड़े साधु, सन्त, योगी हिमालय की गुफाओं में आते रहे हैं और समय-समय पर मानव जाति को मार्गदर्शन दिया है और आम जन को कल्याण का मार्ग दिखाया हैं ।
श्री चरणाश्रित देव के आदेश से मेरे द्वारा श्री साम्ब सदाशिव चरितामृत में भी परमपूज्य सोमवारी बाबा के बारे में लिखा गया हैं जो मेरे जीवन की एक चमत्कारी घटना हैं ।
श्री सदाशिव चरितामृत का निर्माण करते समय श्रीचरणाश्रित देव महेन्द्र महाराज जी ग्रंथ का अवलोकन करने राजगढ़ पधारे थे । झरनों से वापिस आते समय तांगे में आज्ञा दी थी कि प्रभु के चरित्र के साथ श्री सोमवारी बाबा का चरित्र भी यदि आ जावे तो अच्छा होगा । मैंने इस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया, क्योंकि साधक की अनन्यता में मेरा अधिक विश्वास था, संसार में प्रतिपल रत रहने से मति मलिन थी, अत: मैं उस प्रसंग को भूल गया । जिस स्थान पर वह प्रसंग आना चाहिये था उसी स्थान पर अपने आप लिखना बन्द हो गया और दूसरे दिन आगे लिखने के लिये पुस्तक रख दी गई । रात्रि में एक बजे के करीब मैंने स्वप्न देखा कि बड़ी सुन्दर हरी सघन पहाड़ियां दोनों तरफ रंग बिरंगे फूलों से लदी हुई हैं और उन पहाड़ियों के बीच में से एक सकड़ी पगडण्डी जा रही है, उस पगडण्डी पर एक कृशगात सन्त चल रहे हैं, इतने ही में मेरी दाहिनी ओर से स्पष्ट शब्दों में आवाज आती है कि:-
''शास्त्री ! दर्शन करो, सन्त पधार रहे है'' मैंने प्रसन्नता पूर्वक संत महोदय के दर्शन किये और पुन: जिधर से मुझे सम्बोधन करते हुए आवाज आई थी उधर देखा तो श्री मुनीन्द्र भगवान् संत महोदय की ओर दाहिने हाथ की तर्जनी अंगुली से इशारा करते हुए मुझे उधर देखने का आदेश दे रहे थे कि ये हैं सोमवारी बाबा'' । मैं तुरन्त शैया से उठा और इस प्रकार मैंने आगे लिखना प्रांरम्भ कर दिया:- दोहा -अस समरथ सर्वज्ञ शिव, वेदन पावहिं अंत ।
चौ०- परम सुजान तपोनिधि ज्ञानी । ब्रह्मचर्य व्रत रत अति दानी ।
इस प्रकार श्री भगवान् की कृपा और आदेश का पालन करते हुए श्री सोमवारी बाबा का चरित्र चित्रण किया गया । इस प्रकार की समय-समय पर की गई भगवान् की अनुकम्पाओं का कहाँ तक वर्णन किया जा सकता है, केवल यही लिखकर सन्तोष किया जा सकता है कि:- किहिं विधि कृपा करी अनाथपै
यह पुस्तक ''परिचयामृत'' जब आपके हाथों में होगी और आप इस का अध्ययन करेंगे तो आप को ज्ञात होगा की परम पूज्य महेन्द्र बाबा ने अपनी दिव्य लेखनी से हम सब के कल्याण के लिये किस प्रकार मार्गदर्शन दिया हैं ।
व्यक्ति नहीं रहता, आत्मा परमात्मा से मिल जाती हैं लेकिन शब्द, रहा करते हैं, चाहे वे रामायण, रामचरित्र मानस, गीता, भागवत, कुरान और बाईबल किसी भी रूप में हो मानव जीवन को भगवान् का दर्शन कराते रहते है और, एक सही रास्ता दिखाकर उस पर चलने के लिये समय-समय पर बाध्य भी करते रहते है जिससे वह भटके नहीं । श्री 108 श्री महेन्द्र बाबा मेमोरियल ट्रस्ट और उससे जुड़े लोग समाज और साहित्य के बीच एक सेतु का कार्य कर रहे हैं, लोग कुछ भी कहे, अगर किसी देश का साहित्य जीवित है और लोग उसे बार-बार अनेक नये रुपों में पढ़ते है तो वहाँ की संस्कृति जीवित रहती है, और यदि संस्कृति जीवित रहती है जो वह मानव सभ्यता जीवित रहेगी, उसका कितने ही झंझावत आये कोई विनाश नहीं कर पायेगा ऐसा मेरा विश्वास है । हम लोग किसी पुस्तक को एक बार छाप कर 'इति श्री' कर लेते है लेकिन पुस्तक ही वह ''ज्ञान'' का प्रकाश है जो जन-जन तक अगर शुलभ होगी और सस्ते में शुलभ होगी, उतना ही उस विचार धारा का प्रसार होगा और मानव जाति का कल्याण होगा । इसीलिये परम पूज्य महेन्द्र बाबा ने दो कार्य किये है एक तो बाबा (हैड़ाखान बाबा) के मन्दिर बनवाये है और दूसरा साहित्य का स्वयं निर्माण किया है या लोगों को आशीर्वाद देकर करवाया है ताकि व्यक्ति मन्दिरों में जाकर प्रभु का स्मरण करे जिससे आस्था जागृत् हो तथा मूर्ति रुप में प्रभु के दर्शन कर हृदय को शान्ति प्राप्त हों और साहित्य को नित पढ़ें ज्ञान अर्जित करे ताकि उसके जीवन का अन्धकार दूर हो एवं जीवन में प्रकाश हो जाये क्योंकि साहित्य ही मानव के जीवन को रास्ता दिखाकर प्रकाशित कर सकता हैं ।
मैं अब बहुत वृद्ध हो चुका हूँ करीब 95 वर्ष मेरी आयु हो गई है लेकिन बाबा की कृपा और पूज्य महेन्द्र बाबा का आशीर्वाद मुझे और मेरे परिवार पर है, तथा मेरे लघु भ्राता स्व. गिरधारी लाल की सेवा हमारे परिवार के लिये मार्गदर्शक है इसलिये हमारे परिवार का बच्चा-बच्चा भगवान् श्री 1008 श्री हैड़ियाखण्डी के आशीर्वाद और कृपा को प्राप्त कर, उनके कार्य तथा दिखाये रास्ते को जन-जन तक पहुचाये, इससे अच्छा कार्य क्या हो सकता है ।
अन्त में मैं पूज्य महेन्द्र बाबा के अनन्य भक्त जो पूरे परिवार के साथ समर्पित है, श्री चन्द्रप्रकाश सक्सेना दुद्धी (सोन भद्र) निवासी को आशीर्वाद वचन देता हूँ जो इस कलिकाल कलियुग में, तथा अपने परिवार की अनेक जिम्मेदारियों के होते हुए भी पहले भी और अब इस पुस्तक ''परिचयामृत'' में आर्थिक सहयोग प्रकाशन हेतू प्रदान कर रहे है, मैं बाबा से प्रार्थना करता हूँ कि उनके परिवार पर पूज्य 1008 श्री हैड़ाखण्डी देव की कृपा क्षण-क्षण बरसे और पूज्य महेन्द्र बाबा की पूर्ण अनुकम्पा, कृपा से आप और आप के परिवार के समस्त कार्य पूर्ण हो ।
भगवान् का सेवक आचार्य मिश्र विष्णुदत्त शास्त्री अटल दास जी का मन्दिर राजगढ़ (अलवर) राजस्थान श्री हैड़ाखण्डेश्वरी माँ

03
भगवान् श्री हैड़ियाखण्डी बाबाजी
श्री भगवान् का अखण्ड लीला प्रवाह सतत निर्वाध रूप से चलता ही रहता है । विषम गुणमयी लीला तरंग सृष्टिसागर का सहज रूप है । परस्पर विरोधीनी लीला शक्ति से हम सब प्राणीवर्ग सदैव नियन्त्रित रहते हैं । अनेकों पाशों से आबद्ध जीवन संसार चक्र में पथभ्रष्ट हो चक्कर खाता रहता है । प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है परन्तु जिन कर्मों से सुख होगा उन कर्मों को वह त्याग देता है । किंकर्तव्य विमूढ हो जाता है, कोई व्यवस्थित चेतना उसके हृदय में ठहर नहीं पाती है, जैसे पथिक को दिशा का भ्रम हो जाये तो लक्ष्य स्थान पर पहुँचना उसके लिये नितान्त असम्भव हो जाता है, वैसे ही त्रिगुणमयी सृष्टि के प्रचण्ड प्रवाह में प्रवाहमान जीव इस दुस्तर संसार सागर सो पार हो जाए यह भी कठिन है ।
जब प्राणी- ''अमृतस्य पुत्रा:'' जीव स्वसंवेदन विस्मृत कर अनात्म जड़ पदार्थों के प्रति आसक्त होने लगता है, मानव जीवन का लक्ष्य जब केवल भौतिक भोग ही शेष रह जाता है, मिथ्याचार एवं दुराचार अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं । शास्त्र सम्मत सर्वाभीष्ट फल देने वाली साधनाओं के प्रति अरुचि उत्पन्न होने लगती है । आस महापुरुषों के सद्वचन पर अविश्वास बढ़ने लगता है, तब श्री भगवान् विविध शरीर धारण कर हमारा सन्मार्ग दर्शन कराते हैं । स्वयं शास्त्रों का आचरण कर अभ्युदय एवं नि:श्रेयस प्राप्ति का अचूक मार्ग हमारे लिये प्रशस्त करते हैं । महापुरुषों की आज्ञा का पालन करने के लिये सुदृढ़ प्रेरणा प्रदान करते हैं । सात्विकी श्रद्धा से रहित जीवों के हृदय में सद्भावनापूर्ण एवं चिर सुस्थिर आस्था जमाते हैं ।
जिस प्रकार जैसी उनकी विश्व-स्वरूप (स्थूल स्वरूप) शक्ति अनादि अविनश्वर एवं अशुण्रण है, वैसीही लीला शक्ति भी उनकी अचिन्त्य, अगोचर तथा अनन्त गम्भीर, धरावत् सदैव प्रवाहमान है । हृत चैत्य पुरुष के विकास क्रम पर ही यह निर्भर है कि वह अविनाशी के लीला स्वरूप को कहाँ तक आत्मसात् कर सकता है । यह दिव्य त्रिगुणमयी लीला सर्वथा लीला प्रेरक के आधीन है । लीला शक्ति का पूर्ण साक्षात्कार तथा हृदयङ्गम होना लीलाधर की कृपा से ही सम्भव है । सभी मनीषियों का यही मत है कि ईश्वर की प्राप्ति तथा उसका ज्ञान केवल कृपा साध्य ही है। हमारे सनातन धर्माचार्य महर्षियों ने श्री भगवान् के चार स्वरूपों का वर्णन किया है। जिन के नाम, रूप, लीला तथा धाम हैं। श्री भगवान् के दिव्य श्री विग्रह में चारों तत्त्व मानों अन्त:करण चतुष्टयही हैं। यदि किसी भाग्यवान् साधक को इन चारों ईश्वरीय तत्त्वों में एक तत्व पर श्री श्रद्धा विश्वास हो जाए तो वह कृतकृत्य हो जायेगा।
जैसे भक्त का स्वभाव होता है ''तद्विस्मरणे परम व्याकुलता'' उसकी अर्थात् परमात्मा की विस्मृति से भक्त व्याकुल हो उठता हैं। उसी प्रकार श्री भगवान् भी भक्त विरही बन अपनेहृदय धन अनन्य शरणागत के पीछे-पीछे चलते हैं। उसका सम्पूर्ण दायित्व अपने सिर पर ले लेते हैं। श्रीमद्भागवत में श्री भगवान् की सुस्पष्ट आज्ञा है कि ''मैं भक्तों के आधीन हूँ।'' इसी उदार प्रण के अनुसार कौतुकी करुणावरुणालय श्री भगवान् ने विश्व विश्रुत हिमालय के कूर्माच्चल प्रदेश को अपना लीला क्षेत्र चुना। विश्व के कण-कण में व्यास श्री विश्वेश्वर ने अपने ऐश्वर्य तथा माधुर्य से पूर्ण लोकोत्तर चारु चरित्र का दिग्दर्शन कराया। एक व्यक्ति विशेष के रूप में महाअवतारी लीलाधर अपनी अपार करुणा द्वारा एवं अचिन्त्य तथा अभिन्न लीलाशक्ति द्वारा अपयात गुण युक्त सर्व साधारण अस्मदादि जीवों का उद्धार कर रहे थे। मानव की सहज संकीर्ण दृष्टि इतनी सूक्ष्म कहाँ? जो इस महेश्वर महामानव अतिमानव एवं मानवीय सृष्टि के आदि पुरुष की लीला समझ सके। उस महामहिम महेश्वर का लोकोत्तर चरित्र लोकभाषा तथा लोक दृष्टि से बिलकुल परे है। लोक जगत में ही वह रहता है। उसका अविनाशी श्री विग्रह भी लोकवत् ही है तथापि वह सर्वथा अलोकिक है। विश्व कल्याण हेतु श्री विश्वनाथ विश्व शरीर-पार्थिव शरीर धारण करते हैं, फिर भी वह अमर अविनाशी पञ्चतत्वातीत दिव्य शरीर धारण करते हुए अखिल विश्व के प्राणियों में निरन्तर निवास करते है, तथापि यह सुमहान् आश्चर्य ही है कि आज तक उनको 'इद मित्थम्' ऐसा ही है, यह कहने में कोई समर्थ नहीं हुआ।
यह ध्रुव सत्य है कि:- ईशावास्यमिदम्सर्वम्' यह सम्पूर्ण चराचर जगत श्री भगवान् काही वासस्थल हैं। 'मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय?' (गीता) श्री भगवान् ने अपने श्री मुख से कहा है;- हे अर्जुन? मुझ से परे कोई पदार्थ नहीं है। मुझ में सब पदार्थ तथा सब पदार्थों में मैं पूर्ण रूप से व्याप्त हूँ, मैं सारी सृष्टि में, अनन्त ब्रह्माण्डों में इस प्रकार ओतप्रोत हूँ जैसे मणिका में सूत्र और सूत्र में मणिका। उसके साथ हमारा इतना तादात्म्य है, इतना अधिक अभेद है जैसे कि हमारा वहीं एक मात्र है। उसी प्रकार निश्चय जानों हम ही हैं एक मात्र उसके उस सच्चिदानन्द प्रभु ने हमारे लिए भी सच्चिदानन्द का अक्षय कोष दे दिया है। सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये उपयुक्त प्रसाधनों की रचना की है, तब भी हम संतुष्ट नहीं, एक विशिष्ट अभिव्यक्ति की उत्कट अपेक्षा हमें सदैव सताती रहती है। अतएव शास्त्र देखने से यह प्रमाणित होता है कि जब तक हमें उस परात्पर का दर्शन नहीं होता है तब तक हमारी हृदयग्रन्थि, मानसिक संशय तथा श्रुति स्मृति प्रतिपाद्य कर्मों का शुष्कभार हमें कदापि शान्ति नहीं लेने देंगे। भागवती शान्ति शाश्वती शान्ति तभी हमारे लिये सम्भव होगी जब हमारी दृष्टि का विषय श्री भगवान् होंगे।
इसी अभाव की पूर्ति के लिये श्री भगवान् व्यक्ताव्यक्त श्री लीलाधर एक देश विशेष में, एक काल विशेष में एक मानव श्रेष्ठ पुरुषोत्तम के रूप में हमारे चर्म चक्षुओं के समक्ष अहैतुकी करुणावश अवतरित होते हैं। लोक समुदाय उसे अवतार कह अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। विश्व में उनके द्वारा प्रचारित मर्यादा किसी धर्म विशेष के रूप में अर्थात् सामयिक दृष्टिकोण से समर्थित कर्म प्रणालिका बन असंख्य जीवों को कल्याण भागी बनाती हैं।
हम यहाँ जिन महावतारी की चर्चा करने चले हैं वे जनसाधारण में बाबाजी के नाम से विशेष प्रख्यात हैं। किस युग से, किस पद्धति से, वे विश्वनाथ जगदोद्धारक लीला कर रहे हैं, ये सब बातें आजतक पूर्ण रूप से कोई भी समझने में समर्थन न हो सका। श्रुति कहतीहै:- 'विज्ञातारऽमरेकेन विजानीयात्' जो सब का ज्ञाता है उसे कौन जाने।
पावन हिमालय की पवित्र एवं सुरम्य पर्वत मालाओं के मध्य कुमाँउं प्रदेश के सुहावन अञ्चल में इन महावतारी श्री भगवान 'बाबाजी' का परिचय मिला।
सब से पहिले ईसा की अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में आप जन समुदाय में भक्त प्रेम वश आने जाने लगे, यद्यपि आप सदैव तैजस शरीर में विचरते हैं। जहाँ देश काल की सीमा नहीं है, तथापि आगे के चरित्र से पता चलताहै कि स. 1880 के आसपास से आप कृपाकर सर्वसाधारण को भी दर्शन देने की अनुकम्पा करने लगे। उस समय तक आप कुमाऊं में बहुत विख्यात हो चुके थे। महान् सन्त, परम तपस्वी ऊर्ध्वरीता ब्रह्मचारी,अष्ट सिद्धि सम्पन्न योगीराज, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, हनुमान-शिव, त्र्यम्बक, पहाड़ी बाबा तथा सिद्ध बाबा, मृत्युञ्जय बाबा आदि अनेकों नामों से आप पूजित थे। साधु ब्राह्मण सिद्धतपोधन, एवं जिज्ञासू-चिन्तक सब की यह दृढ़ धारणा थी कि श्री बाबाजी ईश्वर हैं, यह अवतार सर्वथा विलक्षण है। षडैश्वर्य भगवान् में जैसे स्वाभाविक रहता है वैसे ही इस श्री विग्रह में सर्व शक्तियों का आश्चर्य जनक आश्रय है। उन्होंने असंख्य बार अपने चर्म चक्षुओं से देखा कि मृतकों को प्राणदान दिये गये, निरक्षरों को वाक्यपटुता तथा आशुकवित्व रचना शक्ति मिली, नि:सन्तानों को पुत्र प्राप्त हुए आर्थिक, संकट ग्रस्त मानव योग-क्षेम के वरदान से सनाथ हुए, देवी सुख के इच्छुक सिद्धिकामी साधकों की सकल सिद्धियाँ अनुचरी बनीं, रोग ग्रस्त त्रिविध ताप सन्तप्त प्राणियों को महा आरोग्य अक्षय शान्ति का लाभ हुआ, वे मुमुक्षु गण-मोक्षार्थी साधक, भारत तक के ही नहीं,यूरोप (बहुत से पाश्चात्य देशों के साधक वर्ग) तथा तिब्बत के सिद्धलामा योगियों के वृहद् समुदाय ने इनकी अभय तथा उदार शरण में आकर स्वाभीष्ट साक्षात्कार किया। भिन्न-भिन्न विचार धारा के सभी धर्म सम्प्रदायों के महान् महान साधकों ने सिद्ध-प्रभु चरणाश्रित हो मनोरथ पूर्ण किये। वर्षों तक हिमालय में 'बाबाजी' की पावन लीला-भूमि में पर्यटन करने के पश्चात् तथा अनेकों महानुभावों से मिलने के उपरान्त उन के विषय में यही कुछ संक्षेप में कहा जा सकता है कि शास्त्र पुराणों में जैसा वर्णन अवतारी प्रभु के विषय में है अथवा जैसे जड़भरत लोमश तथा सनकादि ब्रह्मनिष्ठों का जीवन वृत्त वर्णन किया गया है, उसी दिव्य रहनी एवं भगवदैश्वर्यपूर्ण वातावरण में आप नित्य निरन्तर मग्न रहते हैं, एवं आश्रित जनों को पुण्य दर्शन दे कृतार्थ करते हैं। असाधारण व्यक्तित्व, विराट् विग्रह, दया एवं शक्ति का अश्रुतपूर्व समन्वय तथा दीन हीन जनों के प्रति वरदहस्त वरवश जन-समाज का मन आप की ओर आकर्षित करने लगे। हिमालय के एक गुह्य गिरिकन्दरा से लोकोद्धारिणी कृपा कणिका दिग् दिगन्त में फैलने लगी। श्री देवराज सपरिकर पुष्प वर्षा कर श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने लगे, ऋतुराज अपनी समग्र सुषमा समृद्धि समेट लाये। स्त्री पुरुषों ने अपने जन्म-जन्म के सुकृतों के साकार दर्शन कर जन्म सफल किए। सिद्ध तपोधन महर्षि साधना का समुज्ज्वल स्वरूप प्राप्त कर कृत कृत्य हुए, आर्त एवं दीन जनों की करुण पुकार सार्थक होने लगी। इस महावतारी श्री बाबाजी के अद्भुत तथा अलौकिक लीला व्यापार ने सारे जनपद को एक महा विलक्षण एवं पवित्र आध्यात्मिक आन्दोलन से प्रभावित कर रखा था। पृथ्वी धन धान्य से परिपूर्ण हो गई, सत्य सरलता तथा प्रेम की त्रिवेणी जन जन के हृदय में उमड़ने लगी, दुख दारिद्रय तथा आधिव्याधि दूर भागने लगी। उनका शरीर अपार्थिव है, भक्त वाञ्छा-कल्पतरु श्री भगवान् ने अपने प्रियजनों के संतोषाथ ही यह रहस्यमय श्री लीला विग्रह धारण कर रखा है। उसका भोजन, शयन, चलना- फिरना एवं उठना बैठना सब असामान्य है। विद्वानों ने साधक महानुभावों ने आप ने प्रार्थना की कि:-'बाबा! श्री भगवान् मनुष्यरूप क्यों धारण करते हैं?' श्री बाबाजी महाराज ने कृपाकर कहा कि 'मनुष्य कभी भी ईश्वर के ज्ञान, ध्यान, वा स्मरण-प्रार्थना में सफल नहीं हो सकता था, यदि ईश्वर नर रूप धारण नहीं करता।' अतएव अहैतु की करुणाकन्द श्री भगवान हमारे भगवत्प्रापि मार्ग की सुलभता के लिये अरूपी होते हुये एक रूप विशेष धारण करते हैं। हमारे हृदयासन पर शीघ्र एवं सुलभता से बैठने के लिए हमारे जैसा ही आकार वाला शरीर धारण करते हैं, तत्वातीत भगवान् तत्वाधीन से प्रतीत होते हैं। उस अनन्त की व्याख्या, उसका शील स्वभाव एवं अनुमान प्रमाणादि के विश्लेषण की सार्थकता यही हैं कि हम जिस प्रकार हो उसकी शरण हो जाएं।
उनके विषय में बहुत शोध के पश्चात् यही निष्कर्ष निकला है कि:-श्री ''बाबा'' महाराज जी का कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं बनता था। जहाँ जहाँ श्री महाराज जी जाते थे, वहाँ अनायास ही बिना किसी प्रकार के संकेत के सहस्त्रों स्त्री पुरुष एकत्र हो जाते थे। उनके आगमन का समाचार सुनकर विरले ही व्यक्ति घर में रह सकते थे। वहाँ कोई प्रश्नोत्तर नहीं कर सकता था, दर्शन मात्र से ही चित्त प्रशान्त हो जाता था। किनते ही महामहोपाध्याय, राज्यमन्त्री महान् समाज सुधारक, एवं देश सेवी तथा राजा नवाब आते थे। उपदेश का चरमफल, साधन का सर्वस्वत्व, साध्य का सहज साहचर्य तथा ब्रह्मवेत्ताओं की ब्राह्मी स्थिति ये सम्पूर्ण विभूतियाँ पूज्य स्थिति में सब के लिये सदैव समान सुलभ थीं। सदैव सुस्मित मुख, सकरुण नेत्र, उदार व्यवहार, कृशगात्र बाल सुलभ चेष्टा कुरता- टोपा धोती वस्त्र ये आंगिक दिव्याकर्षण सब के लिये परमानन्द दायक थे। भोजन में अन्न बहुत कम लेते थे, छाछ विशेष पीते थे।
बाबा के प्रेमी वृद्ध सेवकों ने बताया कि माघ के महीने में जब कि तीन फीट तक बर्फ यहाँ पड़ती है उस समय श्री महाराज जी के लिये हमें घर-घर से छाछ मांग कर लाना पड़ता था। छाछ को वे पानी जैसे पीते थे। उनके मलमूत्र में एक विचित्र गंध थी, एक दो घंटे ही में मल मिट्टी हो जाता था। वे जब अपनी मुट्ठी खोलते थे तो सहस्त्रों उपस्थिति भक्त वृन्द एक दिव्य गन्ध से मस्त हो जाते थे, उनके बाल नहीं बढ़ते थे, वे सोते नहीं थे, वस्त्र ओढ़ा दिया तो ओढ़ लिया नहीं तो उन्होंनें न कभी वस्त्र मांगे, न वस्त्र उपस्थित होने पर भी कभी स्वयं उपयोग किया। भक्त बहुत कीमती वस्त्र मुद्रा तथा अन्यायन्य बहुमूल्य वस्तुऐं भेट करते थे। आप उन अपित पदार्थों को देखते भी नहीं थे। हां! भक्त मनोरञ्जनार्थ कभी-कभी बालक के समान दस पन्द्रह मिनिटों तक उन वस्तुओं से खूब खेलते थे, फिर कुछ हो, कोई ले जाए, आप कोई प्रबन्ध नहीं करते थे। मिट्टी और बहुमूल्य पदार्थ सब समान ही थे। शत्रु मित्र, निन्दक प्रशसंक, पापी पुण्यात्मा, उनकी दयामयी दृष्टि में सब समान दया के अधिकारी थे। बहुरूपी श्री बाबाजी हमारे सामने सन्त रूप में प्रकट हुए। इन महावतारी श्री बाबाजी ने सद्गुरु बन भारत भूमि को सारे विश्व में धन्य-धन्य किया, विशेष कर कूर्माञ्चल खण्ड को गौरवान्वित किया:- 'दिव्य कथामृत' में लिखा है :- 'अहो धन्य कूर्माञ्चल वासी। पाये तुम शिव सन्त उदासी।'
आपकी महिमा गान में जब शेष एवं श्रुतियाँ असमर्थ हो जाती हैं तो मै क्षुद्र 'चरणाश्रित' क्या लिख सकता हूँ। ''जोसि सोसि तव चरणनमामि'' जो भी है आप मेरे अराध्य, परम देव हैं। जगदोद्धारक परम कारुणिक महामहिमा सम्पन्न बाबा भगवान सद्गुरु रुप में विचरते हैं। इनके मानव एवं कारुण्यपूर्ण प्राकट्य ने सरस दयामय स्वरूप धारण किया है, शरणागत वत्सल तथा पतितोद्धारक त्र्यम्बक बाबा ने अपने ही अभिन्न अंग श्री सद्गुरु माला की एक उज्ज्वल मणिका के रूप में जड़ान्ध व्यास विश्व को नव चैतन्यालोक सच्चिदानन्द प्रासि का सरलतम साधनप्रदान किया है। उन के विषय में आज अनन्त कण्ठ की यही ध्वनि है कि:-श्रीसद्गुरुदेव जी महाराज ऐसे दयामय देव हैं, जिनके चरण की शरण लेने पर सम्पूर्ण जीवन यात्रा ही सुख पूर्वक सफल हो जाती है। अभी तक जितने भी श्रद्धालु श्री महाराज जी के शरणागत जीव मिले सब सुखी व शान्त देखे गये हैं। लोक प्रसिद्ध एकान्तवासी मुनि, प्रकृति निर्मित गिरि कन्दरा को ही अपना आवास मानने वाले तपस्वी, पृथ्वी माता के दिये हुये अयाचित कन्द मूलादि से ही जीवन निर्वाह करने वाले महाप्रसिद्ध ओजस्वी ब्रह्मचारी, जिनकी चरणधूलि धारण मात्र से ही त्रिविध ऐषणा लौकिक परलौकिक समस्त वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं, ऐसे हमारे पतित पावन, मनस्वी मेधावी, देशकाल से सर्वथा परे, पंच कोष एवं सस चक्र के विज्ञान तथा उत्थापन जिनकी कृपा से अनायास ही हो जाता है, वे ही प्रसिद्ध श्री सद्गुरु माला के परमोज्वल सुमेरु मणिका हैं:- श्री हैडियाखण्ड वाले बाबा –
श्रीचरणाश्रित श्रीसदाशिवकुंज ब्रह्मकुण्ड, वृन्दावन (मथुरा)

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श्री श्री बाबा के चरणों में पुष्पाञ्जलि
विश्व स्रष्टा को जब विश्व में चैतन्य शक्ति का ह्रास तथा तमस् एवं अज्ञान की उत्तरोत्तर वृद्धि का ध्यान होता है, तब वही सच्चिदानन्द धन, विश्वात्मा, परात्पराशक्ति तथा अनन्त करुणावरुणालय परमपितापरमेश्वर अनेकों रूपों में प्रकट होकर धर्म का उत्थान तथा शास्त्र एवं समाज विरुद्ध कर्मों का विनाश करता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने इसी सत्य को अपने परम पुनीत एवं प्रियतम ग्रन्थ श्री मद्भगवद्गीता में इन शब्दों द्वारा वर्णन किया है:-
(गीता अ. ४, श्लोक ७-८) हे भारत ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब-तब ही मैं अपने रूप को प्रकट करता हूँ। क्योंकि साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए तथा दूषित कर्म करने वालों का नाश करने के लिए, और धर्म स्थापन करने के लिए युग-युग में प्रकट होता हूँ। इन्हीं शब्दों को गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने इस प्रकार कहा है:- जब-जब होई धर्म की हानी। बाढ़हि असुर अधम अभिमानी। तब-तब धरि प्रभु विविध शरीरा। हरहिं कृपा
जब-जब धर्म का ह्रास होता है, तब-तब श्री भगवान् इस धरातल पर असंख्य रूप धारण कर सृष्टि एवं समाज की रक्षा करते हैं। प्राणि मात्र का कल्याण स्वधर्म पालन से ही होगा। शास्त्रकारों का यह ध्रुव निश्चय है कि :- "धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षिंत:" अत: श्री भगवान् ने साम्ब सदाशिव रूप धारण कर समस्त विश्व को अपने धर्म पर आरूढ़ किया। महर्षि याज्ञवल्क्य ने धर्म की मीमांसा करते हुए लिखा है। "जो धर्म अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु हैं, वास्तव में वह धर्म, धर्म नहीं है।" इस महावतार के सर्वमान्य ग्रन्थ दिव्यकथामृत में स्पष्ट वर्णन मिलता है:-
श्री भगवान् का अवतार अनन्त रूपों में अनादि काल से होता आ रहा है। सभी अवतारों का उद्देश्य धर्मोत्थान ही रहा है। धर्म स्थापना एवं धार्मिक व्यक्तियों का संरक्षण कार्य सुचारू रूप से सम्पादित हो, यही मुख्य लक्ष्य अवतारों में पाया जाता है। जैसे कि हमारे पूज्य तत्वज्ञ तथा आप्तकाम महर्षियों ने पूर्णावतार श्रीकृष्ण की वन्दना इन शब्दों में की है :- "कृष्णां वन्दे जगद्गुरुम्" जगद्गुरु श्री प्रभु ही एकमात्र दिव्य विग्रहधारी सद्गुरु हैं। महर्षिपतञ्जलि का एक प्रख्यात सूत्र है:-"पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्" वह ईश्वर सबके पूर्वजों का भी गुरु है क्योंकि उसका काल से अवच्छेद नहीं है। वह काल की सीमा से सर्वथा अतीत है, वहां तक काल की पहुँच नहीं है; क्योंकि वह काल का भी महाकाल है। यह तो सर्व विदित सत्य है कि श्री सर्वाराध्य सर्वेश्वर ही गुरु हैं। परन्तु जब श्री भगवान् का प्राकट्य गुरु रूप में हो, अर्थात् श्री विग्रह की वेषभूषा भी मुनीश्वर के अनुरूप हो तब तो जीव को सद्गुरु शरण ग्रहण में अति सुलभता होती है। अपयात् गुणयुक्त जीवों को महाकरुणाकर श्री भगवान् मानो अनन्त दया सागर में आप्लावित कर कृतार्थ करते हैं। श्री भगवान् की अनन्त शक्तियों में दया शक्ति का एक विशिष्ट स्थान है। दयाभिभूत होकर ही दयानिधान भगवान धरातल पर सर्व साधारण को भी दृष्टिगोचर होते हैं। उनके दिव्य दर्शन प्राप्त कर प्राणि मात्र में महाभाव समुद्र उमड़ पड़ता है। उनके दिव्य श्री विग्रह से जो कल्याणकारिणी-महामंगला-दया-मंदाकिनी का अजस्र प्रवाह प्रतिपल प्रवाहमान है, उस अखण्ड एवं अनादि धारा की तीव्र गति में कोई क्षोभ तथा रुकावट डाल सके, ऐसी कोई शक्ति नहीं है। सर्वशक्ति समन्वित श्री दिव्य विग्रह में सभी शक्तियाँ पूर्ण निहित हैं। उस महामहिम महेश्वर का संकल्प ही उनका अस्तित्व है। द्वन्द पूर्ण सृष्टि के सभी पदार्थ उसी के अनुगामी हैं। उन प्रभु के दर्शनाभिलाषी प्राणी का वे सभी शक्तियाँ सब प्रकार से रक्षा करती हैं, तथा साधकों के साधन पथ को सभी विघ्न बाधाओं को नष्ट कर देती हैं। श्री मंगलमय भगवान् का साक्षात्कार जैसे मंगलमय है वैसे ही निश्चय समझो! उनका साधन पथ एवं दिव्य दर्शन भी मंगलमय है, सर्व विघ्नों से रहित है। यहाँ कोई क्लिष्ट साधन की अपेक्षा नहीं है, इस पथ में कोई गोपनीयता नहीं है तथा पात्रापात्र का विचार नहीं किया जाता है। एकमात्र यही चाहते हैं श्री भगवान् कि:- "ओ मेरे प्यारे सखा! ओ मेरे आनन्दस्वरूप!! ओ मेरे प्यारे अंश जीव!!! मन्मना भव मुझमें मन लगा। तू कैसा है यह मत सोच जैसा है वैसे ही आजा। शीघ्रातिशीघ्र आजा। आज तू निश्चय करले:- मेरे लिए ही सनातन शरीर धारी सर्वेश्वर, अनन्त ब्रह्माण्ड व्यापी ब्रह्म तथा योगतन्त्र, कर्म, भक्ति, ज्ञान आदि समस्त सद्गुणों का साकार विग्रह हमारे समक्ष तथा अति सन्निकट खड़ा है। वह खड़ा है। हां एक वहीं हैऔर वही आज हमें अपनी अभय शरण देने के लिए जन्म जन्मान्तर की बुभुक्षा मिटाने के लिए, बुद्धि, मन, प्राण तथा शरीर की दु:सह दग्ध वेदना शांत करने के लिए अपने दोनों श्री वरद्हस्तों से आह्वान कर रहा है- हमें चलना है। बस हमारा यहीं संकल्प है," वह हमारा है, मैं उसका हूँ। यह ध्रुव सत्य है। उस दयानाथ का यह डिंडिम घोष हैं:- "बाबा मनसा फलैगी" यह सर्वाभीष्ट मन्त्र प्रदाता कौन? पहले ही कहा जा चुका है कि श्री भगवान् दया करके अपने दर्शन से चराचर को कृतकृत्य धन्य-धन्य करते हैं। पाठकों ! आओ फिर हम इस महावाक्य को स्मरण कर लें:-
इन्हीं सूत्रों के अनुसार ईसा की सोलहवीं शताब्दी में भारत वर्ष के एक बहु सम्मानित भाग कूर्माञ्चल खण्ड में हमारे परमाराध्य चरित्र नायक महावतारी भगवान् श्री हैड़ाखान वाले बाबा आदर्श योगीश्वर के रूप में प्रकट हुए। सूर्य का प्राकट्य होते ही सब कहने लग जाते है कि ये सूर्यनारायण हैं, वैसे ही श्री बाबा के प्राकट्य ने एक महान आध्यात्मिक आंदोलन का रूप धारण कर लिया। जो दर्शनार्थ आए, जिसे श्री बाबा ने दर्शन दिए एवं जिन महाभाग स्त्री पुरुषों ने उनकी लोक पावनी कीर्ति कथा सुनी सब आत्म विभोर हो गए। नाम स्मरण कर, दिव्य श्री विग्रह की अनुपम सुषमा का दर्शन कर तथा सुधा- संसिक्त मधुरातिमधुर वाणी सुनकर वे महाभाग्यशाली पुन्यात्मावृन्द परमानन्द में निमग्न हो जाते थे। आपकी पावनतम उपस्थिति से चतुर्दिक दया, शांति तथा क्षमा की त्रिवेणी लोक कल्याण करती हुई, पाप-ताप को शमन करती हुई तथा मुमुक्षु जनों को भक्ति ज्ञान का अक्षय कोषलुटाती हुई कहीं मंथर तथा कहीं तीव्र गति में बह रही थी। किस युग विशेष से यह जगदुद्धारक लीला आरम्भ हुई? किस भू-भाग से इस प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार हुआ तथा उसके लोकोद्धारक साधन पथ किस पद्धति से संचालित हैं? इन सब तथ्यों का पूर्ण विवरण देने में कोई समर्थ न हो सका। जीव की स्वाभाविक जिज्ञासा ने इन प्रश्नों का समुचित उत्तर पाने के लिए अथक प्रयत्न किए, किंतु आज तक सफलता किसी को नहीं मिलीऔर न भविष्य में ही कोई इस बात की आशा है। पुत्र अपने पिता के विवाह सम्बन्धी वार्ता से जैसे अनभिज्ञ है वैसे ही यह जीव भी सदाशिव की महिमा जानने में सर्वथा असमर्थ है। हाँ एक ही मार्ग है कि करुणाकन्द महेश्वर अहेतुकी कृपावश अपना सूक्ष्मातिसूक्ष्म परिचय प्रदान कर दें। हम असमर्थ जीवों की जिज्ञासा पूर्ण करुण क्रन्दन को श्रवण कर कृपालु भगवान् नेअपनी संतानों को व्याकुल भटकते देखकर अत्यन्त गोपनीय गूढ़ तत्व सर्व समक्ष प्रकट किया। अनन्त जन्म पर्यंत बड़े कष्ट साध्य प्रयत्नों द्वारा भी हम जिसके दर्शन ज्ञान तथा प्रेम से वञ्चित रहते हैं, वे ही हम सर्वोपाय शून्य जीवों की सुधि लेने के लिये साधारण स्थिति में देश कालानुसार प्रकट होते हैं, यथा:- दोहा – विविध विश्वलीला रची, भांति-भांति सुख दैन। अंश शुद्ध कहं विमुख लखि, आवत शिव सुधि लैन॥
उन प्रभु ने संसार के दुखी प्राणियों को सुख पहुँचाने हेतु नाना प्रकार की सांसारिक लीलाओं का निर्माण किया हैं। वे प्रभु अपने शुद्ध अंश जीवात्मा को अपने से विमुख देखकर उसकी सुधि लेने के लिये आया करते हैं। (श्री भगवान एकमात्र धर्म की रक्षा के हेतु ही अवतार नहीं लेते अपितु अपने अंश जीवात्मा पर कृपा करने हेतु भी अवतार लेते हैं।) वे अपनी अनिर्वचनीयता को लोप कर हमारी वाणी के विषय बनते है। विराट् रूप धारी विश्वात्मा एक शरीरस्थ चैतन्य से प्रतीत होते हैं। ये सब क्रियाएं उस दुर्गम भागवती तत्व को सर्व सुलभ बनाने के लिये ही हैं। आपने श्री मुख से इस वचन का मण्डन किया हैं-
अत: सब जीवों को अपनी शरण में लेने के लिए श्री प्रभु ने तीन अमोघ साधन प्रदान किए हैं। चित्र, चरित्र तथा चिन्तन ये प्रभु प्रदत्त रत्नत्रय हैं। जैसे श्री भगवान् को पूर्ण रूप से व्यक्त करना असम्भव है, वैसे ही 'चिन्तन' का महात्म्य साधनाओं में सर्वोपरि है। द्वितीय साधन है 'चरित्र' श्रवण और तृतीय साधन है 'चित्र'। इन्हीं तीनों साधनों में सब साधन ओत-प्रोत हैं। देवर्षि श्री नारद ने अपनी भक्ति सूत्र में श्री भगवान के प्रति ग्यारह प्रकार की आसक्तियों का वर्णन किया है, परन्तु उनमें चित्र तथा चिंतन ही मुख्य माना जाता है। ये दो भगवान् के चित्र और उनके श्री नामों का मनन चिंतन-कीर्त्तन साधनही सर्वत्र पाया जाता है। भागवती सृष्टि के एक-एक कण भगवत्सत्ता से परिपूर्ण हैं। सभी साधन श्रेयस्कर हैं, परन्तु सुलभता एवं श्रेष्ठता की दृष्टि से भी 'चिन्तन साधन' अर्थात् नाम स्मरण अद्वितीय है। भगवान के नाम, लीला तथा धाम का सुमिरन-चिंतन श्रेय और प्रेय को देने वाला है। जगद्गुरु श्रीकृष्ण नेयह प्रतिज्ञा की हैं:-
(गीता अ. ९ श्लो. २२) जो अनन्य भाव से मेरे में स्थित हुए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिंतन करते हुए, निष्काम भाव से भजते हैं; उन नित्य एकीभाव से मेरे में स्थिति वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं कर देता हूँ॥ अहा बन्धूओ ! जब परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण उन चिंतको के पीछे उनका योगक्षेम वहन करते चल रहे हैं तो भला उस भगवत्प्रदत्त साधन सम्राट 'चिंतन' की महिमा कोई क्या गा सकता हैं? चिंतन के द्वारा चिन्तक चिन्तामणि बन जाता है। ऋषियों की यह आज्ञा है:-
परन्तु सृष्टि का नियम है कि जो पदार्थ जितने महत्व के होते हैं, उन महत्वपूर्ण पदार्थों की प्राप्ति सहज नहीं है। अत: चिंतन को अपने चित्त में स्थायित्व देने के लिए हमें 'चित्र' तथा 'चरित्र' का सहारा लेना पड़ेगा। चित्र साधन अपने श्री विग्रह के दिव्यदर्शन द्वारा भगवान से वार्ता तथा परिचय आदि का अधिकार प्रदान करता है। वर्तमान विज्ञान चित्र जगत में अपूर्व प्रगति कर रहा है। जिनका हम चित्र लेते हैं, वे जड़ हों व चेतन हों, केवल शारीरिक हो नहीं हम उनके तत्कालीन मन: स्थिति से भी कुछ सम्बद्ध हो जाते है ऐसी सेंसेटिव प्लेट अब उपलब्धहैं। चिंतन तथाचित्र का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। चिंतन द्वारा दिव्य विग्रह की रचनाहोती है एवं चित्र-मूर्ति दर्शन द्वारा चिंतन की धारा फूट पड़ती है। श्री भगवान् कृपा कर अपने दर्शनों द्वारा जीव कल्याण कर रहे थे। ईसा की सोलहवीं शताब्दि में भगवान् श्री हैड़ाखान वाले बाबा, शिव बाबा, त्र्यम्बक बाबा, पहाडी बाबा, सिद्ध बाबा महामुनीन्द्र भगवान्, ब्रह्मचारी बाबा आदिनामों से जाने जाते थे। कतिपय प्रेमी अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य कहकर आपको मानते थे। बहुत से भक्त मण्डल में आप सद्गुरु शिरोमणि श्री हनुमानजी के रूप में पूजित थे। कूर्माञ्चल लीला के अंतिम भाग में आपने श्री कैलाश पर्वत के समीप नैनीताल जिले में हलद्वानी से प्राय: १४ मिल पर हैड़ाखान नामक स्थान पर अष्ट कोण युक्त सुन्दर शिवालय का निर्माण कराया। उसी स्थान के नाम से आप विख्यात हुए। उन अनामी का नाम भक्तों ने श्री हैड़ाखान वाले बाबा रख दिया। काश्मीर से आसाम तक हिमालय पहाड़ हैं। जहाँ अनेकों साधु महापुरुषों का आवास है, वहाँ हम अपने आराध्य बाबा को बिना किसी नाम से सम्बन्धित किए कैसे रह सकते हैं। नाम ही हम आज के साधन शून्य जीवों का एकमात्र अवलम्ब है। अत: श्री बाबा के भक्त महानुभावों ने उसी अपने अनामी वा बहुनामी बाबा को श्री हैड़ाखान वाले बाबा, श्री हैड़ियाखण्डी बाबा तथा श्री हैड़ियाखानी बाबा आदि नाम से स्मरण करने लगे। अब बन्धुओं! तुम बाबा के नाम से परिचित हो गए।
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योगी श्री श्यामाचरण लाहिड़ी
श्री भगवान् ने जीवों को सब प्रकार से सुखी करने के लिये अनेकों प्रकार की लीलाऐं रचीं, जिनमें यह भी एक लीला है कि अपने अंश स्वरूप जीव के संरक्षण हेतु मानव शरीर धारण करते हैं, जैसे निश्चित समय पर पुत्र घर न आए तो पिता को स्वाभाविक वात्सल्य भाव चिंतित कर देता है। सब कामों को त्याग वह शिशु की स्मृति में व्यग्र हो जाता हैं। उसी प्रकार परात्पर सर्वेश्वर का अंश रूप जीव जब श्री भगवान् को भूल जाता है तो जगतपिता परमात्मा हम जीवों को पुन: अपने पास बुलाने के लिए स्वयं सशरीर हमारे समाज में पधारते हैं। जीव गर्भावस्था में यही प्रतिज्ञा करता है, उस अवर्णनीय भीषण यन्त्रणाओं से विदग्ध जीव व्याकुल हो यह आर्तनाद करता है कि हे प्रभो?
मातरः विविधाः दृष्टाः पितरः सुहृदस्तथा॥'' ''यदि योन्याः प्रमुच्येयं तत्रहद्ये महेश्वरम्॥'' (मैंने अनेकों प्रकार के (लेह्य, भोज्य चोष्य, पेय) भोजन किये और अनेकों योनियों में भटक-भटक बहुत से मातृ स्तनों का दुग्ध-पान किया, माता, पिता, बंधु तथा बान्धवों को बहुत बार देखा अब यदि आपकी कृपा से इस दुस्तर भयावह योनि से मुक्त होऊंगा। तो हे महेश्वर! मैं सर्वात्मना आपकी ही आराधना करूंगा। प्रसव काली वेदना जच्चा तथा बच्चा दोनों को महाकष्टदायक होती है, शास्त्रकारों ने लिखा है कि साठ हजार बिच्छू काटने के बराबर उस समय वेदना होती है। उस समय का दुखी जीव असह्य वेदना से व्यग्रजीव एवं अनन्त ज्वालाओं से दग्धजीव बड़े आर्तभाव से आर्त्रा ण परायण श्री भगवान् का स्मरण करता है। वह सर्वोपायशून्य असमर्थ जीव अपना मार्मिक दु:ख प्रकट करता है, परन्तु उस प्रचंड ताप पूर्ण पीड़ा से छुटकारा पाते ही देह गेह (घर और शरीर) के अनन्त तथा दुरत्यय भ्रांति चक्र में फँस जाता है। अच्छी तरह से श्री भगवान् को भूलकर परिणामी दुखदायी तथा नश्वर प्रपञ्च का पक्का पुजारी हो जाता है, वह तो श्रुतियों के शब्दों में ''पराङ्ग पश्यति नान्तरात्मा।'' वह अविद्याग्रसित जीव अनात्म जड़ पदार्थों को ही देखता है। आत्म तत्व श्री भगवत् स्वरूप से यह सर्वथा अनभिज्ञ हो जाता है। कठपुतली का नाच सब देखते हैं, किंतु पर्दे के पीछे सूत्रधार को कोई नहीं देखता है। परमात्मा की अपार शक्ति को प्राणी विस्मृत करने की चेष्टा करता है, जब ईश्वर अंश अविनाशी तथा सहज सुखराशी जीव, अविद्या, मृत्यु एवं दुख दैन्य से त्रस्त हो जाता है, तब श्री भगवान् हमें बिछुडे, पथभ्रष्ट तथा निज उद्धार जन्य चेष्टा से हीन समझ, एकमात्र अहैतुकी कृपा द्वारा ही हमारा इस दुस्तर संसार सागर से उद्धार करते हैं, उसदुरवस्था में केवल श्री प्रभु कृपा ही अवलम्ब है, अत: कृपावारिधर श्री भगवान् की दयाशक्ति का शरीर आज सृष्टि के भीषण संताप एवं असह्य दु:ख को देख रोमाञ्चित हो गया। दयामय श्री भगवान् का स्वभाव स्मरण आते ही दृढ़ता हृदय में आ बैठी। साश्रु नेत्र हो श्री भगवान् 'बाबा' से दया मां प्रार्थना करने लगी।:- ''तुम पालक करुणामय दाता। नव स्वभाव नहिं जग
जब-जब नाथ विपति अति बाढ़ी। लोक अनाथ
सत्वर तब तुम तब ही धाए। नर पशु विविध सुवेश बनाये॥''
हे करुणामय दाता ! यह आपका कोई नवीन स्वभाव नहीं है, आपकी तो यह पुरातन बान है कि जब- जब जीव आधि-व्याधि और विपत्तियों से घिर जाता है सम्पूर्ण लोक अनाथवत् अरक्षित से प्रीत होने लगते हैं, तथा बुद्धि किसी भी समस्या का हल निकालने में अपनी नितान्त असमर्थता प्रकट करती है, तब हे दयानाथ ! आप ही तो उन दु:खी जीवों की करुण पुकार सुन अतिशीघ्र मानव या पशु आदि का अनेकों सत्य एवं सुन्दर स्वरूप धारण कर दौड़े-दौड़े आते हैं। अहा! श्री दया माँ प्रभु से सत्य ही तो कह रही हैं, कृपाधीन हो श्री भगवान् ने कौनसा काम नहीं किया? उन्होंने कौनसा रूप धारण नहीं किया, उस महामहिम महेश्वर के लिये कुछ भी असम्भव नहीं। प्रतिपल वे समर्थ सर्व-सत्ताधारी श्री साम्ब सदाशिव जीव कल्याण में ही निरत रहते हैं। वे करुणाकन्द सदाशिव जीव की प्रतीक्षा करते रहते हैं। नव प्रसूता जननी जैसे अपनी संतति के लिये सदा सतर्क रहती है, वैसे ही श्री साम्ब सदाशिव अपनी संतानों की प्रतीक्षा आतुर भाव से करते रहते हैं। वे परम गुरु हमें इन उदार शब्दों से आश्वस्त करते हैं- 'सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज। उस सच्चिदानंद का प्राणी मात्र के लिए यह शाश्वत आह्वान है, तुम जैसे भी हो मेरे पास आओ, मैं तुम्हारी प्रतीक्षा हृदय से करता हूँ। ऐ मेरे वत्स! मैं तुम्हें देखने के लिए आतुर दृष्टि से चिर प्रतीक्षावान् हूँ।'' श्री दिव्य कथामृत में लिखा है :-
यह श्री भगवान् का सहज स्वभाव है, इसी उदार प्रण के कारण अमर गुरु श्री बाबा जी महाराज आज हिमालय की पावन उपत्यका में प्रशान्त भाव से विराजमान हैं। वैसे तो वे एक स्थानपर नहीं रहतें हैं, कभी अकेले या कभी जन-समुदाय के साथ आप इन पर्वतमालाओं में विचरण करते रहते हैं। ये भोलानाथ योगीश्वर यथाधिकार सभी प्राणियों को सनाथ करते रहते हैं। प्रच्छन्न रूप से अनेकों शरीर धारण कर ये सर्व समर्थ योगेश्वर ब्रह्माण्ड व्यापी लोकरक्षण लीला में तत्पर रहते हैं, परंतु आज किसी व्यक्ति विशेष पर कृपा वृष्टि होने वाली है वे परम सौभाग्यशाली एक वंगवासी नवयुवक हैं, उनका अनेक जन्मों का अर्जित पुण्य, जन्म-जन्मान्तर की उत्कट एवं उग्र साधना तथा इन सम्पूर्ण शास्त्र पुराणादिका ज्ञान सफल हो गया। वे हैं स्वनाम धन्य श्री श्यामाचरणलाहिड़ी महाशय, आपका जन्म बंगाल प्रान्त के नदिया जिला के किसी छोटे से ग्राम में हुआ। आपके पिता श्री गौरमोहन लाहिड़ी महाशय परम शिव भक्त थे, उन्होंने एक शिव मंदिर भी बनवाया था, श्री श्यामाचरण जी की माता का नाम श्री मुक्तकेशी देवी था। माता जी शिव की पूजा श्रृंगार अधिक करती थीं। श्री श्यामाचरण को बड़ा अनुकूल वातावरण मिला। काशी ही में उन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी, फारसी तथा वेद पढ़े। विद्याध्ययन के अतिरिक्त उनको यह भी सुयोग प्राप्त हुआ कि पुण्य क्षेत्र काशी में महासिद्ध संत विद्वान् साधकों के दर्शन एवं संग लाभ हुए। श्री लाहिड़ी महाशय के संबंध में उनके पौत्र श्री आनंदमोहन लाहिड़ी बी०ए० तथा परमहंस श्री योगानंद जी ने विस्तृत रूप से लिखा है। परम श्रद्धेय, योगी प्रवर श्री लाहिड़ी महाशय ने भी स्वयं अपने शिष्य श्री युक्तेश्वर गिरि से यह पावन प्रसंग कहा था। साधकों के लिये अत्यन्त उपयोगी प्रसंग यहाँ बहुत संक्षिप्त रूप में दिया जा रहा है। श्री लाहिड़ी महाशय को अपने अमर गुरु के प्रथम दर्शन तेतीसवें वर्ष में हुए थे। ई० सन् १८६१ की शरद ऋतु में वे दानापुर (बिहार) में मिलिट्री विभाग में एकाउन्टेंट के पद पर काम कर रहे थे। एक दिन प्रात:काल ही ऑफिस सुपरिन्टेंडेंट ने उनको बुलाकर कहा कि ''लाहिड़ी''! आपका एक तार अभी हैड ऑफिस से आया है, आपको रानीखेत (अल्मोड़ा) जाना पड़ेगा वहाँ एक मिलिट्री छावनी बनने वाली है। यह आदेश पाते ही श्री लाहिड़ी जी अपने एक नौकर को साथ लेकर पाँच सौ मील की लम्बी यात्रा पर चल पड़े। इस यात्रा में उनको तीस दिन लगे। कहीं घोड़ा पर तथा कहीं घोड़ा गाडी से यह यात्रा पूरी हुई रानीखेत सुविस्तृत हिमालय प्रदेश देखकर श्री लाहिड़ी महाशय को बड़ा हर्ष हुआ। श्री लाहिड़ी महाशय के ऑफिस का काम अधिक नहीं था, अत: वे भव्य पर्वतमालाओं में घण्टों तक प्रशान्त भाव से विचरण करते रहते थे, महान् सन्तों की उपस्थिति से यह प्रदेश धन्य है। इस प्रदेश में महान् शिव-कल्प योगीश्वर गण सदैव विहार करते रहते हैं, इस प्रकार की बहुत सी अश्रुत पूर्व बातें श्री श्यामाचरण जी की कानों में आने लगीं, फलत: इनके मन में भी यह जिज्ञासा तीव्र हो उठी कि मैं भी ऐसे महात्मा के दर्शन करूं। एक दिन मध्यान्ह के समय श्री लाहिड़ी महाशय द्रोणाचल की ओर भयानक जंगल तथा दुर्गम गिरि शिखरों को पार करते हुये जा रहे थे कि अचानक उनको बगल से ऐसा शब्द सुनाई पड़ा कि कोई परिचित व्यक्ति उनका नाम लेकर बुला रहा है, किन्तु महाशय जी ने इन शब्दों पर ध्यान नहीं दिया और आगे को बढते ही चले, क्योंकि सन्ध्या समय से पहिले ही उनको अपने स्थान पर पहुँचना था। अन्त में वे खुली जगह पर पहुंचे, जहां पर एक तरफ कुछ छोटी- छोटी गुफाऐं भी बनी थी, वहां महाभाग लाहिड़ी जी ने क्या देखा कि एक शिलाखंड पर महातेजस्वी सन्त खड़े हैं, इनसे संभाषण के लिये अपने पास बुलाने का संकेत कर रहे हैं। श्री लाहिड़ी दर्शन कर आश्चर्य चकित हो गये, केवल ताँबा सदृश चमकीले बालों में ही अंतर था, अन्यथा श्री लाहिड़ी जी जैसी ही आकृति उन दिव्य महापुरुष की थी। 'लाहिड़ी तू आ गया! इस प्रकारये सन्त पुरुष लाहिड़ी जी से बाते करने लगे'। इस गुफा में विश्राम ले। आराम कर, मैंने ही तुमको बुलाया था। इसके पश्चात् श्यामाचरण महोदय ने एक छोटी सी स्वच्छन्द गुफा में प्रवेश किया, उस गुफा के अन्दर बहुत ऊनी कम्बल तथा कमंडल आदि थे। लाहिड़ी तुमको पूर्व जन्म की स्मृति नहीं है? क्या तुम कभी यहां पर रहते थे? श्री लाहिड़ी महाशय इन वाक्यों को सुनकर स्तम्भित से हो गये, तथा कुछ २ मन में भय भी होने लगा कि कहीं यह ठगों का समुदाय तो नहीं है। यहां हमारा परिचय नाम धाम आदि का किसी को पता नहीं है। ये व्यक्ति कैसे मेरा परिचय जानते हैं? श्री लाहिड़ी जी को चिंतित देख श्री बाबा भगवान ने उनके पिता, पितामह आदि का भी पूरा परिचय दे दिया, अपने पूर्वजों के परिचय सुन लाहिड़ी जी अवाक् रह गये, एक शुष्क भाव से उन्होंने महावतारी सद्गुरु के चरण स्पर्श किए, उन महापुरुष से उन्होंने निवेदन भी किया कि ये व्यर्थ बातें आप क्यों कर रहे हैं। लाहिड़ी जी की आतंरिक संघर्षमय अवस्था देख दयामय श्री सद्गुरु ने अपने कर कमलों से लाहिड़ी महाशय को स्पर्श प्रदान किया सर पर श्री वरद हस्त रखते ही उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई अनेकों जन्म की विस्मृत स्मृतियां साकार होकर उनके सामने नाचने लगीं, गुहा के अन्दर की सभी वस्तुऐं श्री लाहिड़ी महाशय के ही उपयोग की वस्तुऐं थी। उस स्थान की एवं अपने पूर्वजन्म के महासमर्थ योगेश्वर अनन्त विभूति सम्पन्न दयामय श्री गुरुदेव को भी पहचानते अब देर न लगी। प्रेमांजन छुरित तथा अश्रु पूरित नेत्रों से श्री बाबा भगवान् के दिव्यतम दर्शन कर श्री श्यामाचरण जी आज अपने को कृत-कृत्य समझने लगे। पुन: पूज्य श्री बाबा ने आज्ञा दी कि तुम कुछ काल मेरे समीप ही रहो।, ऑफिस तुम्हारे लिए यहाँ आयाहै, तुम ऑफिस के लिए नहीं आये हो। श्री गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य कर श्री लाहिड़ी महाशय अपना आवश्यक काम-काज समास कर यहां आ गये। यह स्थान द्रोणागिरि के पास गगास नदी के मूल में स्थित है। रानी खेत से द्रोणाचल प्राय: १४ मील है। उस समय तो मार्ग बड़ा कठिन था, परन्तु अब तो नियमित मोटर सर्विस चालू हैं। श्री लाहिड़ी महाशय ने अपने शिष्यों से कहा है कि उस स्थान पर बहुत से लोगों को भोजन मिलता था, जिसके मन में जो पदार्थ खाने की इच्छा होती थी, उस व्यक्ति को वही पदार्थ प्राप्त होता था, तथापि किसी को यह पता नहीं चलता था कि भोजन कहां से आता है, वहां पर किसी प्रकार की भोजनशाला नहीं थी श्री लाहिड़ी महाशय के लिये श्री बाबा की गुफा के एक कौने में एक छोटा सा पात्र रहता था, जब श्री लाहिड़ी महाशय श्री गुरुदेव के दर्शन को आते तो उन्हें श्री बाबाजी संकेत द्वारा आज्ञा करते थे कि तुम्हारे लिये यह भोजन है, तुम इसे खाओ। कुछ दिनों थे। तक यही क्रम चलता रहा, एक दिन श्री लाहिड़ी महाशय जब पात्र के पास पहुँचे तो पात्र को देखकर विस्मित से हो गये। कारण यह था कि नित्य प्रति महाशय जी को पूरी, हलवा, खीर तथा दाल भात आदि इच्छित पदार्थ प्राप्त होते थे, किन्तु आज यह क्या? इस पात्र में तो अरन्डी का तेल भरा है। क्या किसी से प्रमाद वश तो ऐसा नहीं हुआ है। इसी सोच विचार में लाहिड़ी जी पड़े थे, कि सहसा एक आवाज आई। श्री लाहिड़ी महाशय को सम्बोधन करते हुए, तीव्र स्वर में श्री बाबा ने आज्ञा की ''श्यामाचरण देखता क्या है? यह तुम्हारे लिए ही है, इसे पी डालो, आज अच्छा मुहूर्त है, आज ही मैं तुमको योग दीक्षा दूंगा।'' बिना किसी हिचकिचाहट के लाहिड़ी महाशय उस तेल को पी गये, पश्चात् श्री बाबा की आज्ञा हुई कि ''लाहिड़ी नदी किनारे चले जाओ।'' लाहिड़ी जी धीरे-धीरे नदी तट पर आए अरन्डी का तेल पीने के कारण उनको इतने दस्त और वमन हुये कि वे मृत प्राय: ही हो गये। वहीं गगास नदी के तट पर आप अर्द्ध चैतन्यावस्था में पड़े रहे, मानसिक दु:ख का लेश भी नहीं था। महाशक्तिधर श्री गुरुदेव द्वारा सञ्चारित शक्ति से आप हिमालय के अत्यन्त कठोर शीत तथा भयावह शारीरिक दौर्बल्य को सहर्ष सहन कर रहे कृपाअनुप्राणित जीव में सहज ही सब सामर्थ्य आ जाती है।
रात्रि के मध्य काल में सहसा श्री लाहिड़ी जी के पास एक व्यक्ति आए, ये महानुभाव श्री बाबा के अष्ट सिद्धि सम्पन्न शिष्य थे, आते ही शीघ्र उन्होंने श्री श्यामाचरण जी को जल से निकाला और पहिनने के लिये एक सूखा वस्त्र दिया, वे महापुरुष श्री लाहिड़ी जी को अपने साथ ले चले, उन्होंने कहा कि, '' श्री गुरुदेव तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं, अत: शीघ्र चलो।'' श्री लाहिड़ी महाशय तथा वे गुरु भाई दोनो मार्ग में जा रहे थे, श्री श्यामाचरण जी ने आश्चर्यपूर्वक कहा कि क्या सूर्योदय हो गया? यह प्रकाश कैसा? गुरुभाई ने उत्तर दिया अभी तो रात बहुत है। यह प्रकाश स्वर्ण भवन का है। श्री गुरुदेव ने तुम्हारे लिए यह सुन्दर सुहावना सोने का महल अनन्त योगैश्वर्य से निर्माण किया है, उस रत्न जटित सुन्दर प्रसाद को देख लाहिड़ी महाशय मुग्ध हो गये। महल के अन्दर प्रवेश करने पर उन्होंने देखा कि सुन्दर बाग, तड़ाग, कूप तथा सम्पूर्ण साज सज्जा एवं राज्य वैभव से यह महल परिपूर्ण है, उसी दिव्य महल में एक बहुत प्रकाशमान सिंहासन पर श्री गुरुदेव विराजमान हैं। अनेकों प्रकार की मणिओं का सम्मिश्रत प्रकाश बहुत ही सुन्दर तथा आनन्द-वर्द्धक था, वहां पर बहुत से शिष्यगण उपस्थित थे, जिनमें कई सिद्ध-सिद्धेश्वर पद तक पहुंचे हुये थे। अनेकों प्रेम लक्षणा भक्ति में आदर्श थे। याज्ञिक महानुभाव गण यज्ञ हवन आदि वैदिक कर्मों के महापारंगत थे, वहां नित्य ही प्रभु सान्निध्य में सवेरे और शाम दोनों समय यज्ञाहुति होती थी, यज्ञ पुरुष भगवान श्री हैडियाखण्डी बाबा को यज्ञ बहुत प्रिय था, यज्ञ में आपभी विराजते थे, श्री गुरुदेव के यज्ञ में घी के स्थान पर जल का प्रयोग अधिक होता था, आपका जल हवन कुमाऊं में सर्वत्र प्रसिद्ध है। (आज भी ऐसे सौभाग्यशाली जीव जीवित हैं जिन्होंने श्री बाबा भगवान द्वारा जल हवन आँखों देखा है।) इन्हीं विशिष्ट महानुभावों के मध्य श्री श्यामाचरण जी भी श्री गुरुदेव को प्रमाण कर बैठ गये। सदाशिव सद्गुरु ने कृपा कर उन्हें योग दीक्षा दी। दीक्षा तत्व परम गुह्य है। श्री गुरुदेव तथा शिष्य कायह अचिन्त्य सम्बन्ध लेखनी व वाणी का विषय नहीं है। श्रद्धेय श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय आज पूर्ण को प्राप्त कर पूर्ण हो गये। उन्होंने बहुत श्रद्धा एवं करुणा पूर्वक श्री गुरुदेव के चरणों में प्रार्थना की, कि हे नाथ! अब मुझे यह आज्ञा प्रदान कीजिये कि मैं निरन्तर आपकी ही सेवा में रहूँ। श्री 'बाबा' ने सस्मित मुखार विन्द से कहा- 'श्यामाचरण तुमको घर ही जाना होगा, तुम्हारी शादी हो चुकी है, अत: गृहस्थाश्रम में रहकर ही तुम साधन करो। एक योगाचार्य के रूप में तुम समाज में ही रहो, साधन विमुख जीवों को साधन परायण बनाओं।' श्री गुरुदेव के मुख से यह वचन सुनकर लाहिड़ी जी बहुत खिन्न एवं विह्वल हो गये, उनकी यह विरह जन्य दु:ख दशा देख श्री भगवान ने उन्हें योग सिद्धि का आशीर्वाद दिया और यह वरदान दिया कि ''लाहिड़ी! जब तुम मुझको बुलाओगे, मैं तुम्हारे पास आ जाऊंगा'' इस वरदान से नव साधक श्री श्यामाचरण को बहुत आश्वासन मिला, बारम्बार साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रमाण कर श्री श्यामाचरण महाशय उस स्थान से चले करबद्ध एवं अश्रु पूरित नेत्र से वियोगजन्य भीषण हृदय विदारक कष्ट को सहन किया, और अपने हृदयेश्वर भगवान् को, महाशय जी ने श्री गुरुदेव शिष्य मण्डल तथा परम पावन नगाधिराज हिमालय को अपनी विनम्र हार्दिक प्रणति निवेदन कर वहां से प्रस्थान किया।
रानीखेत छोड़ने के पश्चात् श्री लाहिड़ी महाशय अपने कुछ मित्रों से मिलने के लिए मुरादाबाद (उत्तरप्रदेश में एक जिला) आये, वहाँ पर कुछ लोगों में यह बात हो रही थी कि अब संसार में सिद्ध पुरुष या श्री भगवान् का अवतार विग्रह नहीं है, ये शब्द लाहिड़ी महाशय को सहन नहीं हुए, उन्होंने वहाँ के उपस्थिति सज्जनों से दृढ़तापूर्वक कहा कि आपकी ये मान्यता असत्य है, आज भी इसी पृथ्वी पर सिद्धगण विचरते हैं। वे लोग श्री श्यामाचरण जी से ऐसे महापुरुष के दर्शन कराने के लिये आग्रह करने लगे, श्री महाशय ने उन लोगों से कहा कि मुझे एकान्त स्थान बता दो। एक निर्जन कोठरी में बैठकर श्री श्यामाचरण जी ने महाशक्ति सम्पन्न अमर गुरु का ध्यान किया और कृपावश श्री बाबा भगवान् का आविर्भाव हुआ, वहाँ की समस्त उपस्थित मंडली ने श्री बाबा के दिव्य दर्शन एवं श्री चरण स्पर्श किए, कुछ प्रसाद का भी भोग लगाया गया तथा सभी महानुभावों ने प्रसाद पाया। इस घटना को देख सब विस्मित हो गए और श्री श्यामाचरणजी की प्रशंसा करने लगे, परन्तु श्री बाबा को यह व्यवहार अप्रिय लगा, उन्होंने कहा:- ''श्यामाचरण तुमको यह खेल दिखाने के लिए, वरदान नहीं मिला है, तुमने व्यर्थ ही मुझको बुलाया, अब मैं तुम्हारे बुलाने से नहीं आऊंगा, जब मैं उचित समझूंगा तब स्वयं ही तुम्हारे पास आऊंगा। इस घटना से लाहिड़ी जी को अपार दुख हुआ, साथ ही उनके मित्रों को भी कष्ट हुआ कि हमारे कारण ही श्री श्यामाचरण जी को यह विषाद हुआ।
श्री गुरु दर्शन के पश्चात् श्यामाचरण जो गृहस्थाश्रम में ही रहे, अनेकों जीवों को उन्होंने सत्यपथ पर लगाया, आपके सत्संग में हिन्दू, मुसलमान तथा ईसाई आदि साधक भी थे। योगानन्द जी ने अमेरिका में ''क्रिया योग'' का बहुत प्रचार किया है। भारत में भी कई प्रान्तों में श्री श्यामाचरण लाहिड़ी जी के अनुयायी साधकगण पाये जाते हैं।
श्री श्यामाचरण लाहिड़ी अपने समय के प्रख्यात संत थे, काशी का बाबा इस नाम से भी आप विख्यात थे, आपके सत्संग में बहुत प्रतिष्ठित लोग भी थे, सबसे अधिक आश्चर्य उस दिन लोगों को हुआ, जब काशी के विश्व विख्यात योगीराज श्री तैलङ्ग स्वामी अपनी गणमान्य शिष्य मंडली सहित विराजमान थे, उसी समय धोती कुर्ता पहिने हुए श्री श्यामाचरण जी स्वामी जी के दर्शन को आए, महाशय जी को देखते ही तैलङ्ग स्वामी उठकर खड़ें हो गये, बहुमान पूर्वक लाहिड़ी महाशय को हृदय से आलिङ्गन किया, तथा आसन पर बैठाया। लाहिड़ी महाशय के चले जाने परभक्त समुदाय ने श्री तैलङ्ग स्वामी जी से पूछा कि आपने एक गृहस्थी भोगी को इतना आदर क्यों दिया। श्री तैलङ्ग स्वामी ने गम्भीर शब्दों में कहा:- ''जिस पद की प्राप्ति के लिये साधक को लंगोटी तक का त्याग करना पड़ता है वह अवस्था श्री गुरु कृपा से इस गृहस्थ को प्राप्त है।'' एक दिन काशी में श्री लाहिड़ी महाशय ध्यान में बैठे थे कि अचानक वे श्री रामगोपाल को साथ ले दशाश्वमेघ घाट पर पहुँचे। वहां एक श्री माताजी जो श्री बाबा की बहिन कहलाती थीं वह भी वहीं उपस्थित थीं, सबने श्री बाबा भगवान् को साष्टाङ्ग प्रणाम किया। श्री बाबा ने आज्ञा की कि ''अब मैं इस शरीर को छोड़ दूंगा''। सभी भक्तों ने भगवान् से प्रार्थना की कि आप शरीर रखें व त्याग दें आपके लिये दोनों ही बराबर है, इस प्रार्थना से दयामय देव अति द्रवीभूत हो गये तथा आज्ञा हुई ''ऐसा ही होगा''। हमारा महाभाग्य है कि श्री बाबा उसी शरीर से हमारे मध्य रह रहें हैं, उनकी अहैतुकी दया से हम सब जीव प्रतिपल सुरक्षित हैं।
श्रद्धेय श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ने साधक वर्ग से यही कहा था:-''ध्यान द्वारा प्रत्यक्ष अनुभूति का आस्वादन करो और श्री भगवान के साक्षात्कार के लिये सदैव तत्पर रहो।"
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परम पूज्य श्री सोमवारी बाबा
वीतरागीएकान्तवासी मुनियों को जो सुख प्राप्त होता है, वह सुखदेवराज इन्द्र तथा चक्रवर्ती सम्राट को भी दुर्लभ है।
परम विरक्त, सिद्ध सिद्धेश्वर, विश्व वंद्य महात्मा श्री श्री सोमवारी बाबा का नाम श्री परमानंद जी ब्रह्मचारी था। प्रत्येक सोमवार को आपके आश्रम में बृहत् भण्डारा (अतिथि सेवा) होताथा, अत: सर्व साधारण में आप श्री सोमवारी बाबा के नाम से विख्यात थे। आपका जन्म स्थान पंजाब प्रांत के रावल जिलान्तर्गत पीड दादनखान नामक स्थान में था। एक परम कुलीन सारस्वत ब्राह्मण वंश में आप अवतीर्ण हुए। अनुमान से प्रतीत होता है कि आपकी शास्त्रीय शिक्षा सामान्य ही थी। बाल्यावस्था में ही श्री बाबा महाराज घर छोड़कर विरक्त रूप से समस्त तीर्थ स्थानों में निर्द्वन्द भाव से विचरण किया करते थे आपकी वाणी बहुत ही मधुर थी। श्री सोमवारी बाबा कभी-कभी प्रेमवश निज अंतरंग शिष्यों भक्तों को 'साला' कहकर डांट भी लगा देते थे। भक्तगण सदैव लालायित रहते थे कि बाबा हमको भी डांट लगाएं। उनके पुनीत आश्रमों में यह एक विशेषता थी कि वहां कोई भी व्यक्ति मर्यादा पालन किए बिना ठहर नहीं सकता था। आप वर्णाश्रम धर्म पालन की शिक्षा देते थे। वे बड़े उदार प्रकृति के थे, उस वर्णाश्रम धर्म पालन में संकीर्णता को लेशमात्र भी स्थान नहीं था श्री सोमवारी बाबा ''सर्व भूत हिते रता:'' के जाज्वल्यमान मूर्ति थे। इनके आश्रमों में सदा सब प्राणी सुखपाते थे। बहुत दूर- दूर के सिद्ध, साधक तथा आर्त जिज्ञासु जीव आपकी शरण में आते थे। आपकी महती योग सम्पदा से परिचित होकर अपने को धन्य-धन्य मानते थे। पूज्य श्री सोमवारी बाबा की कृपा से जीवों के आध्यात्मिक उत्थान तो होते ही थे, इसके साथ ही ऐहिक सुखेच्छुक जनता की आशाएं भी पूर्ण हो जाती थीं। आप सब प्राणियों को अन्न से तृप्त करते थे। मनुष्य, गौ, बन्दर, मछली तथा अन्यान्य जीवों को जो सहस्राधिक की संख्या में एकत्र हो जाते थे सबको बड़े स्नेह पूर्वक बाबाजी सुन्दर तथा स्वादिष्ट पदार्थों का भोजन कराते थे। श्री बाबा योग एवं ज्ञान के दुरूह एवं कठिन विवादास्पद प्रसंग भी बहुत सरलता से समझा देते थे। वाणी के माध्यम से श्री बाबाजी बात करते थे परन्तु उनको जिस विषय का बोध कराना होता था, उस विषय का सम्यक् ज्ञान हृदय द्वारा ही हृदय में प्रेरित कर प्रदान करते थे। श्री महाराज जी के सम्पर्क में आए हुये कतिपय महानुभावों से मिलने पर इन सब बातों की पुष्टि विशेष रूप से हुई हैं।
श्री सोमवारी बाबा का लीला स्थल एवं साधना स्थल विशेषकर नर्मदा और हिमालय रहा है। कुमाऊँ प्रान्त के नैनीताल जिले में ''पदमबोरी'' नामक एक महान तीर्थ विख्यात है। इसी पावन भूमि में आपने वर्षों तक निवास किया, उस प्रदेश का यह स्थान महाचैतन्य श्मशान भूमि हैं। यहाँ त्रिवेणी संगम का भी अपूर्व सुन्दर दृश्य है। विश्व विख्यात संत एवं सुधारक स्वामी श्री विवेकानन्द जी यहां पर आये थे, यहां की पवित्रता, सुरम्यता तथा आध्यात्मिक महापुरुषों के श्रेयस्कर दर्शनों से वे परम आह्लादित हुए। एक समय भारत के प्रख्यात संत पागल श्री हरनाथ भी पदम बोरी आश्रम में आए थे, इन प्रेमोन्मत्त महात्मा की विचित्र अवस्था को देखकर आश्रम के उपस्थित व्यक्तियों ने उपहास किया। श्री बाबा सबको सम्बोधित करते हुये बोले:- ''यह सन्त हैं तुम नहीं जानते हो, यह एक दिन महान् सन्त होगा। पूज्य श्री बाबाजी की आज्ञा सुनकर सब प्रेमीगण श्री हरनाथ को प्यार करने लगे।''
श्री सोमवारी बाबा परम आदर्श सन्त थे। उनकी दिनचर्या साधकों के लिये अनुकरण की वस्तु थी। त्रिकाल सन्ध्या, शिवार्चन तथा हवन यज्ञ नित्य ही आश्रम में होता था। जहाँ बाबजी कुछ समय रहते थे वहां पर श्री शिवलिङ्ग की स्थापना भी करवाते थे। सभी जीवों की कल्याण कामना करते हुए ये परम विरक्त महापुरुष अपनी उपस्थिति से इस प्रांत को सुशोभित कर रहे थे। आपके पावन संग से तथा सरल सुबोध उपदेश से देश देशांतर के जीव अपने जनम को सफल करने लगे। भगवान् श्री हैड़ियाखंडी से प्राय: भक्तगण यह पूछा करते थे कि श्री सोमवारी बाबा कैसे संत है? श्री हैड़ियाखंडी बाबा कहते थे कि 'ऐसे संत आज विश्व में दुर्लभ है, ये अद्वितीय ब्रह्मचारी हैं'। देखा भी गया कि श्री सोमवारी बाबा महाराज ने प्राय: चालीस-पचास वर्षों तक कूर्माञ्चल में निवास किया परन्तु किसी माता के दर्शन नहीं किये। स्त्री दर्शन आपने जीवन पर्यन्त नहीं किया, यह महाव्रत आपके प्राण के साथ ही गया। श्री सोमवारी बाबा श्री हैड़ियाखंडी भगवान् का बहुत आदर करते थे। विद्वत्समाज एवं साधक मण्डल में यही विश्वास है कि आप भगवान् श्री हैड़ियाखंडी के शिष्य थे। उनसे कोई पूछता था कि श्री हैड़ियाखंडी बाबा कौन है? वे बड़े भाव- विभोर हो कहते थे ''अरे! वे भगवान् हैं। ऐसा सिद्ध त्रिलोकी में नहीं है'' और भी बहुत सी गुह्य बातें भगवान् श्री हैड़ियाखंडी के विषय में गद्-गद् होकर कहते थे।
मैं एक समय नैनीताल में था। वहाँ श्री सोमवारी बाबा के दर्शन प्राप्त साधक श्री हीरावल्लभ जी मिले, उन्होंने यह परम रहस्यमयी कथा सुनाई। श्री सोमवारी बाबा साधारण साधकों से कहते थे कि श्री हैड़ियाखंडी बाबा के पेट में जिस गृहस्थ का एक टुकड़ा भी जाये उस महाभाग की सराहना देव वृन्द भी करते हैं। उनसे जो साधक विशिष्ट भावापन्न तथा अनन्य शरणापन्न श्री सोमवारी बाबा के थे, उन सज्जनों से वे इस प्रकार कहते थे- 'अरे ! गंगा बह रही है, जो लाभ ले सको ले लो।' यह त्रैलोक्य पावनी सुरसरि सब सुखप्रदान करने वाली है।'' तथा जो साधकों में सर्वोपरि दशा के थे उनसे श्री महाराज इस प्रकार कहते थे- ''अरे ! मेरी बातों पर विश्वास करोगे? सभी उपस्थित भक्त वृन्द कर बद्ध प्रार्थना करते थे-प्रभो ! आज्ञा कीजिये! श्री सोमवारी बाबा बड़े गम्भीर एवं मृदु शब्दों में कहते थे- '' अरे! इनको सृष्टि के सभी देवता हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। जब दोनों महापुरुष एकत्र होते थे तो गंगा यमुना के संगम स्थल का सा दृश्य उपस्थित हो जाता था। शीघ्र ही बहुत से दर्शनार्थी वहां आ जाते थे। तत्कालीन अनेक महानुभावों का कथन है कि श्री सोमवारी बाबा के आसन पर भगवान् श्री हैड़ियाखंडी के अतिरिक्त और किसी महानुभाव को बैठते नहीं देखा। श्री सोमवारी बाबा को यह ज्ञात हो ही जाता था कि हैड़ाखान वाले बाबा यहाँ पधार रहे हैं। अतः आप शीघ्र अपने आसन से उठकर कुछ दूर आगे जाते थे। भगवान् श्री हैड़ियाखंडी के चरण स्पर्श करते थे और प्रमाण के अनन्तर बड़े आदर पूर्वक अपने आसन पर बैठाते थे। उस समय के दिव्य दर्शनों से सारा समाज आनंद विभोर हो जाता था। एक समय भगवान् श्री हैड़ियाखंडी ने श्री सोमवारी बाबा से बारह बजे मध्य रात में गौ का ताजा-कच्चा दूध माँगा। श्री सोमवारी बाबा ने एक भक्त को ३ मील दूर एक गांव में भेजा, वहां एक ब्राह्मण के घर में एक पयस्विनी (दुधारू) गौ थी। किसी कारणवश घरवालों ने गौ का दूध नहीं निकाला था। जब सोमवारी बाबा के आदमी पहुँचे तो उन लोगों को इस बात का ज्ञान हुआ। शीघ्र उनने उस गौ का दूध निकाल कर उस आदमी को दिया। श्री सोमवारी बाबा दूध लेकर जब उपस्थित हुए तो भगवान् श्री हैड़ियाखंडी अश्रृ पूर्ण नेत्रों से तथा गद्-गद् वाणी द्वारा सोमवारी बाबा की असीम योग विभूतियों की प्रशंसा करने लगे।
परम पूज्य श्री सोमवारी बाबा के भक्तों का यह दृढ़ विश्वास है कि श्री बाबा दूसरी सृष्टि रचना करने में भी समर्थ है। एक कथानक भी भक्तों के द्वारा इस प्रकार प्रचलित है, नैनीताल का एक वकील महाराज का परम भक्त था। श्री सोम वारी बाबा के दर्शनों के लिए प्रायः वह पद्मबोरी आश्रम में आया करता था। श्री बाबा के दर्शनों के लिए वह घोड़ा लेकर नैनीताल से पदमबोरी को चला, मार्ग में वर्षा के कारण उसे रुकना पड़ा अतः भयानक जङ्गल में संध्या हो गई। इन स्थानों से व्याघ तथा भालू आदि बहुत से हिंसक जीव जन्तु रहते हैं। संध्या की अन्धकारमयी रजनी तथाप्राणन्त का संदेह, ये दोनों संध्या और सन्देह ने मिलकर वकील साहिब का धैर्य तोड़ दिया। वह बडे कातर भाव से अचिन्त्य शक्ति धर श्री गुरु सोमवारी बाबा का स्मरण करने लगा। सहसा वकील क्या देखता है? एक ग्रामीण व्यक्ति उसके पास आया, उसके हाथ में चीड़ की लकड़ी की आग जल रही थी। वह आग्रह एवं आदर से घोड़ा तथा वकील को घर ले गया। वहाँ से करीब एक मील की दूरी पर एक छोटा सा स्वच्छ पानी का झरना था। एक दो मंजिला मकान था। वह घर बहुत ही साफ सुथरा था, मकान के नीचे के भाग में घोड़ा बांध दिया और ऊपर की मंजिल में वकील के लिए आसन बिछा दिया। तदुपरान्त भोजन के लिये वह आग्रह करने लगा। वकील आलस्य- वश मना कर रहा था, परन्तु उसने एक भी बात न मानी। अन्त में वकील साहब ने भोजन बनाया और प्रसाद पाकर वहीं उस रात को विश्राम किया। प्रातः काल फिर वही ग्रामीण व्यक्ति आया, घोड़े के साथ वकील साहब को उसी रास्ते पर छोड़ आया। जब वकील सवेरे ही पदमबोरी के आश्रम में प्रविष्ट हुआ तो सभी उपस्थित व्यक्ति महाआश्चर्य चकित हो गये, सबने उससे पूछा कि तुम इतनी जल्दी नैनीतालसे कैसे आ गये? वकील ने सब कथा सुनाई, परन्तु लोगों ने विश्वास नहीं किया। यह अच्छी तरह सबको मालूम था कि इस क्षेत्र के आस-पास पाँच-पाँच मीलों तक कोई ग्राम या घर नहीं है। वकील अपने मन का एवं अन्य भक्तों के मन का भ्रम मिटाने के लिये दो-चार व्यक्तियों को साथ लेकर उस दिशा की ओर चला, बहुत-बहुत दूरों तक तथा बहुत देर तक खोज बीन की, किन्तु सब प्रयास व्यर्थ था। कारण सही तो ये था कि वे सब घटना श्री बाबा की भक्त वत्सलता थी। उनकी अचिन्त्य महाशक्ति की एक नगण्य कणिका मात्र थी। उनके दयामय पावन श्री चरणों में हमारा बारम्बार प्रणाम।

07
श्रीमन्मुनीन्द्र सूक्त
हैड़ियाखण्डी, हैड़ियाखण्डी, हैड़ियाखण्डी, बोल। ईश्वर सत् चित् आनंद बोल। साम्बसदाशिव साम्बसदाशिव साम्बसदाशिव बोल। पालक प्रेरक जगपति बोल। ''सर्वाधिकार सुरक्षित'' प्रथम संस्करण 2003 प्रकाशक : श्री 108 श्री महेन्द्र बाबा मेमोरियल ट्रस्ट 3/688, अरावली विहार, अलवर ( राज० ) ☎ 0144-2334317 प्रथम संस्करण गुरु पूर्णिमा-2003 ''परिचयामृत''
इस पुस्तक का हिन्दी पाठ बाबाजी लाइब्रेरी द्वारा OCR (अक्षर-पहचान) के माध्यम से तैयार किया गया है, ताकि यह दुर्लभ ग्रन्थ सुरक्षित रहे और सबके लिए निःशुल्क सुलभ हो सके। इस परम्परा के अनेक ग्रन्थों का हमने अंग्रेज़ी एवं अन्य भाषाओं में अनुवाद भी
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