एक परिचय

भगवान् श्री हैड़ियाखण्डी बाबाजी

श्री चरणाश्रित — “महेन्द्र बाबा” — कृत परिचयामृत का परिचयात्मक निबंध, यहाँ सम्पूर्ण रूप में प्रस्तुत।

ॐ श्री सद्‌गुरवे नमः

श्री भगवान् का अखण्ड लीला प्रवाह सतत निर्वाध रूप से चलता ही रहता है । विषम गुणमयी लीला तरंग सृष्टिसागर का सहज रूप है । परस्पर विरोधीनी लीला शक्ति से हम सब प्राणीवर्ग सदैव नियन्त्रित रहते हैं । अनेकों पाशों से आबद्ध जीवन संसार चक्र में पथभ्रष्ट हो चक्कर खाता रहता है । प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है परन्तु जिन कर्मों से सुख होगा उन कर्मों को वह त्याग देता है । किंकर्तव्य विमूढ हो जाता है, कोई व्यवस्थित चेतना उसके हृदय में ठहर नहीं पाती है, जैसे पथिक को दिशा का भ्रम हो जाये तो लक्ष्य स्थान पर पहुँचना उसके लिये नितान्त असम्भव हो जाता है, वैसे ही त्रिगुणमयी सृष्टि के प्रचण्ड प्रवाह में प्रवाहमान जीव इस दुस्तर संसार सागर सो पार हो जाए यह भी कठिन है ।

जब प्राणी- ''अमृतस्य पुत्रा:'' जीव स्वसंवेदन विस्मृत कर अनात्म जड़ पदार्थों के प्रति आसक्त होने लगता है, मानव जीवन का लक्ष्य जब केवल भौतिक भोग ही शेष रह जाता है, मिथ्याचार एवं दुराचार अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं । शास्त्र सम्मत सर्वाभीष्ट फल देने वाली साधनाओं के प्रति अरुचि उत्पन्न होने लगती है । आस महापुरुषों के सद्वचन पर अविश्वास बढ़ने लगता है, तब श्री भगवान् विविध शरीर धारण कर हमारा सन्मार्ग दर्शन कराते हैं । स्वयं शास्त्रों का आचरण कर अभ्युदय एवं नि:श्रेयस प्राप्ति का अचूक मार्ग हमारे लिये प्रशस्त करते हैं । महापुरुषों की आज्ञा का पालन करने के लिये सुदृढ़ प्रेरणा प्रदान करते हैं । सात्विकी श्रद्धा से रहित जीवों के हृदय में सद्भावनापूर्ण एवं चिर सुस्थिर आस्था जमाते हैं ।

जिस प्रकार जैसी उनकी विश्व-स्वरूप (स्थूल स्वरूप) शक्ति अनादि अविनश्वर एवं अशुण्रण है, वैसीही लीला शक्ति भी उनकी अचिन्त्य, अगोचर तथा अनन्त गम्भीर, धरावत् सदैव प्रवाहमान है । हृत चैत्य पुरुष के विकास क्रम पर ही यह निर्भर है कि वह अविनाशी के लीला स्वरूप को कहाँ तक आत्मसात् कर सकता है । यह दिव्य त्रिगुणमयी लीला सर्वथा लीला प्रेरक के आधीन है । लीला शक्ति का पूर्ण साक्षात्कार तथा हृदयङ्गम होना लीलाधर की कृपा से ही सम्भव है । सभी मनीषियों का यही मत है कि ईश्वर की प्राप्ति तथा उसका ज्ञान केवल कृपा साध्य ही है। हमारे सनातन धर्माचार्य महर्षियों ने श्री भगवान् के चार स्वरूपों का वर्णन किया है। जिन के नाम, रूप, लीला तथा धाम हैं। श्री भगवान् के दिव्य श्री विग्रह में चारों तत्त्व मानों अन्त:करण चतुष्टयही हैं। यदि किसी भाग्यवान् साधक को इन चारों ईश्वरीय तत्त्वों में एक तत्व पर श्री श्रद्धा विश्वास हो जाए तो वह कृतकृत्य हो जायेगा।

साधक और साध्य दोनों के भाव सापेक्ष होते हैं।

जैसे भक्त का स्वभाव होता है ''तद्विस्मरणे परम व्याकुलता'' उसकी अर्थात् परमात्मा की विस्मृति से भक्त व्याकुल हो उठता हैं। उसी प्रकार श्री भगवान् भी भक्त विरही बन अपनेहृदय धन अनन्य शरणागत के पीछे-पीछे चलते हैं। उसका सम्पूर्ण दायित्व अपने सिर पर ले लेते हैं। श्रीमद्भागवत में श्री भगवान् की सुस्पष्ट आज्ञा है कि ''मैं भक्तों के आधीन हूँ।'' इसी उदार प्रण के अनुसार कौतुकी करुणावरुणालय श्री भगवान् ने विश्व विश्रुत हिमालय के कूर्माच्चल प्रदेश को अपना लीला क्षेत्र चुना। विश्व के कण-कण में व्यास श्री विश्वेश्वर ने अपने ऐश्वर्य तथा माधुर्य से पूर्ण लोकोत्तर चारु चरित्र का दिग्दर्शन कराया। एक व्यक्ति विशेष के रूप में महाअवतारी लीलाधर अपनी अपार करुणा द्वारा एवं अचिन्त्य तथा अभिन्न लीलाशक्ति द्वारा अपयात गुण युक्त सर्व साधारण अस्मदादि जीवों का उद्धार कर रहे थे। मानव की सहज संकीर्ण दृष्टि इतनी सूक्ष्म कहाँ? जो इस महेश्वर महामानव अतिमानव एवं मानवीय सृष्टि के आदि पुरुष की लीला समझ सके। उस महामहिम महेश्वर का लोकोत्तर चरित्र लोकभाषा तथा लोक दृष्टि से बिलकुल परे है। लोक जगत में ही वह रहता है। उसका अविनाशी श्री विग्रह भी लोकवत् ही है तथापि वह सर्वथा अलोकिक है। विश्व कल्याण हेतु श्री विश्वनाथ विश्व शरीर-पार्थिव शरीर धारण करते हैं, फिर भी वह अमर अविनाशी पञ्चतत्वातीत दिव्य शरीर धारण करते हुए अखिल विश्व के प्राणियों में निरन्तर निवास करते है, तथापि यह सुमहान् आश्चर्य ही है कि आज तक उनको 'इद मित्थम्' ऐसा ही है, यह कहने में कोई समर्थ नहीं हुआ।

यह ध्रुव सत्य है कि:- ईशावास्यमिदम्सर्वम्' यह सम्पूर्ण चराचर जगत श्री भगवान् काही वासस्थल हैं। 'मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय?' (गीता) श्री भगवान् ने अपने श्री मुख से कहा है;- हे अर्जुन? मुझ से परे कोई पदार्थ नहीं है। मुझ में सब पदार्थ तथा सब पदार्थों में मैं पूर्ण रूप से व्याप्त हूँ, मैं सारी सृष्टि में, अनन्त ब्रह्माण्डों में इस प्रकार ओतप्रोत हूँ जैसे मणिका में सूत्र और सूत्र में मणिका। उसके साथ हमारा इतना तादात्म्य है, इतना अधिक अभेद है जैसे कि हमारा वहीं एक मात्र है। उसी प्रकार निश्चय जानों हम ही हैं एक मात्र उसके उस सच्चिदानन्द प्रभु ने हमारे लिए भी सच्चिदानन्द का अक्षय कोष दे दिया है। सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये उपयुक्त प्रसाधनों की रचना की है, तब भी हम संतुष्ट नहीं, एक विशिष्ट अभिव्यक्ति की उत्कट अपेक्षा हमें सदैव सताती रहती है। अतएव शास्त्र देखने से यह प्रमाणित होता है कि जब तक हमें उस परात्पर का दर्शन नहीं होता है तब तक हमारी हृदयग्रन्थि, मानसिक संशय तथा श्रुति स्मृति प्रतिपाद्य कर्मों का शुष्कभार हमें कदापि शान्ति नहीं लेने देंगे। भागवती शान्ति शाश्वती शान्ति तभी हमारे लिये सम्भव होगी जब हमारी दृष्टि का विषय श्री भगवान् होंगे।

इसी अभाव की पूर्ति के लिये श्री भगवान् व्यक्ताव्यक्त श्री लीलाधर एक देश विशेष में, एक काल विशेष में एक मानव श्रेष्ठ पुरुषोत्तम के रूप में हमारे चर्म चक्षुओं के समक्ष अहैतुकी करुणावश अवतरित होते हैं। लोक समुदाय उसे अवतार कह अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। विश्व में उनके द्वारा प्रचारित मर्यादा किसी धर्म विशेष के रूप में अर्थात् सामयिक दृष्टिकोण से समर्थित कर्म प्रणालिका बन असंख्य जीवों को कल्याण भागी बनाती हैं।

हम यहाँ जिन महावतारी की चर्चा करने चले हैं वे जनसाधारण में बाबाजी के नाम से विशेष प्रख्यात हैं। किस युग से, किस पद्धति से, वे विश्वनाथ जगदोद्धारक लीला कर रहे हैं, ये सब बातें आजतक पूर्ण रूप से कोई भी समझने में समर्थन न हो सका। श्रुति कहतीहै:- 'विज्ञातारऽमरेकेन विजानीयात्' जो सब का ज्ञाता है उसे कौन जाने।

पावन हिमालय की पवित्र एवं सुरम्य पर्वत मालाओं के मध्य कुमाँउं प्रदेश के सुहावन अञ्चल में इन महावतारी श्री भगवान 'बाबाजी' का परिचय मिला।

सब से पहिले ईसा की अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में आप जन समुदाय में भक्त प्रेम वश आने जाने लगे, यद्यपि आप सदैव तैजस शरीर में विचरते हैं। जहाँ देश काल की सीमा नहीं है, तथापि आगे के चरित्र से पता चलताहै कि स. 1880 के आसपास से आप कृपाकर सर्वसाधारण को भी दर्शन देने की अनुकम्पा करने लगे। उस समय तक आप कुमाऊं में बहुत विख्यात हो चुके थे। महान् सन्त, परम तपस्वी ऊर्ध्वरीता ब्रह्मचारी,अष्ट सिद्धि सम्पन्न योगीराज, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, हनुमान-शिव, त्र्यम्बक, पहाड़ी बाबा तथा सिद्ध बाबा, मृत्युञ्जय बाबा आदि अनेकों नामों से आप पूजित थे। साधु ब्राह्मण सिद्धतपोधन, एवं जिज्ञासू-चिन्तक सब की यह दृढ़ धारणा थी कि श्री बाबाजी ईश्वर हैं, यह अवतार सर्वथा विलक्षण है। षडैश्वर्य भगवान् में जैसे स्वाभाविक रहता है वैसे ही इस श्री विग्रह में सर्व शक्तियों का आश्चर्य जनक आश्रय है। उन्होंने असंख्य बार अपने चर्म चक्षुओं से देखा कि मृतकों को प्राणदान दिये गये, निरक्षरों को वाक्यपटुता तथा आशुकवित्व रचना शक्ति मिली, नि:सन्तानों को पुत्र प्राप्त हुए आर्थिक, संकट ग्रस्त मानव योग-क्षेम के वरदान से सनाथ हुए, देवी सुख के इच्छुक सिद्धिकामी साधकों की सकल सिद्धियाँ अनुचरी बनीं, रोग ग्रस्त त्रिविध ताप सन्तप्त प्राणियों को महा आरोग्य अक्षय शान्ति का लाभ हुआ, वे मुमुक्षु गण-मोक्षार्थी साधक, भारत तक के ही नहीं,यूरोप (बहुत से पाश्चात्य देशों के साधक वर्ग) तथा तिब्बत के सिद्धलामा योगियों के वृहद् समुदाय ने इनकी अभय तथा उदार शरण में आकर स्वाभीष्ट साक्षात्कार किया। भिन्न-भिन्न विचार धारा के सभी धर्म सम्प्रदायों के महान् महान साधकों ने सिद्ध-प्रभु चरणाश्रित हो मनोरथ पूर्ण किये। वर्षों तक हिमालय में 'बाबाजी' की पावन लीला-भूमि में पर्यटन करने के पश्चात् तथा अनेकों महानुभावों से मिलने के उपरान्त उन के विषय में यही कुछ संक्षेप में कहा जा सकता है कि शास्त्र पुराणों में जैसा वर्णन अवतारी प्रभु के विषय में है अथवा जैसे जड़भरत लोमश तथा सनकादि ब्रह्मनिष्ठों का जीवन वृत्त वर्णन किया गया है, उसी दिव्य रहनी एवं भगवदैश्वर्यपूर्ण वातावरण में आप नित्य निरन्तर मग्न रहते हैं, एवं आश्रित जनों को पुण्य दर्शन दे कृतार्थ करते हैं। असाधारण व्यक्तित्व, विराट् विग्रह, दया एवं शक्ति का अश्रुतपूर्व समन्वय तथा दीन हीन जनों के प्रति वरदहस्त वरवश जन-समाज का मन आप की ओर आकर्षित करने लगे। हिमालय के एक गुह्य गिरिकन्दरा से लोकोद्धारिणी कृपा कणिका दिग् दिगन्त में फैलने लगी। श्री देवराज सपरिकर पुष्प वर्षा कर श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने लगे, ऋतुराज अपनी समग्र सुषमा समृद्धि समेट लाये। स्त्री पुरुषों ने अपने जन्म-जन्म के सुकृतों के साकार दर्शन कर जन्म सफल किए। सिद्ध तपोधन महर्षि साधना का समुज्ज्वल स्वरूप प्राप्त कर कृत कृत्य हुए, आर्त एवं दीन जनों की करुण पुकार सार्थक होने लगी। इस महावतारी श्री बाबाजी के अद्भुत तथा अलौकिक लीला व्यापार ने सारे जनपद को एक महा विलक्षण एवं पवित्र आध्यात्मिक आन्दोलन से प्रभावित कर रखा था। पृथ्वी धन धान्य से परिपूर्ण हो गई, सत्य सरलता तथा प्रेम की त्रिवेणी जन जन के हृदय में उमड़ने लगी, दुख दारिद्रय तथा आधिव्याधि दूर भागने लगी। उनका शरीर अपार्थिव है, भक्त वाञ्छा-कल्पतरु श्री भगवान् ने अपने प्रियजनों के संतोषाथ ही यह रहस्यमय श्री लीला विग्रह धारण कर रखा है। उसका भोजन, शयन, चलना- फिरना एवं उठना बैठना सब असामान्य है। विद्वानों ने साधक महानुभावों ने आप ने प्रार्थना की कि:-'बाबा! श्री भगवान् मनुष्यरूप क्यों धारण करते हैं?' श्री बाबाजी महाराज ने कृपाकर कहा कि 'मनुष्य कभी भी ईश्वर के ज्ञान, ध्यान, वा स्मरण-प्रार्थना में सफल नहीं हो सकता था, यदि ईश्वर नर रूप धारण नहीं करता।' अतएव अहैतु की करुणाकन्द श्री भगवान हमारे भगवत्प्रापि मार्ग की सुलभता के लिये अरूपी होते हुये एक रूप विशेष धारण करते हैं। हमारे हृदयासन पर शीघ्र एवं सुलभता से बैठने के लिए हमारे जैसा ही आकार वाला शरीर धारण करते हैं, तत्वातीत भगवान् तत्वाधीन से प्रतीत होते हैं। उस अनन्त की व्याख्या, उसका शील स्वभाव एवं अनुमान प्रमाणादि के विश्लेषण की सार्थकता यही हैं कि हम जिस प्रकार हो उसकी शरण हो जाएं।

उनके विषय में बहुत शोध के पश्चात् यही निष्कर्ष निकला है कि:-श्री ''बाबा'' महाराज जी का कोई निश्चित कार्यक्रम नहीं बनता था। जहाँ जहाँ श्री महाराज जी जाते थे, वहाँ अनायास ही बिना किसी प्रकार के संकेत के सहस्त्रों स्त्री पुरुष एकत्र हो जाते थे। उनके आगमन का समाचार सुनकर विरले ही व्यक्ति घर में रह सकते थे। वहाँ कोई प्रश्नोत्तर नहीं कर सकता था, दर्शन मात्र से ही चित्त प्रशान्त हो जाता था। किनते ही महामहोपाध्याय, राज्यमन्त्री महान् समाज सुधारक, एवं देश सेवी तथा राजा नवाब आते थे। उपदेश का चरमफल, साधन का सर्वस्वत्व, साध्य का सहज साहचर्य तथा ब्रह्मवेत्ताओं की ब्राह्मी स्थिति ये सम्पूर्ण विभूतियाँ पूज्य स्थिति में सब के लिये सदैव समान सुलभ थीं। सदैव सुस्मित मुख, सकरुण नेत्र, उदार व्यवहार, कृशगात्र बाल सुलभ चेष्टा कुरता- टोपा धोती वस्त्र ये आंगिक दिव्याकर्षण सब के लिये परमानन्द दायक थे। भोजन में अन्न बहुत कम लेते थे, छाछ विशेष पीते थे।

बाबा के प्रेमी वृद्ध सेवकों ने बताया कि माघ के महीने में जब कि तीन फीट तक बर्फ यहाँ पड़ती है उस समय श्री महाराज जी के लिये हमें घर-घर से छाछ मांग कर लाना पड़ता था। छाछ को वे पानी जैसे पीते थे। उनके मलमूत्र में एक विचित्र गंध थी, एक दो घंटे ही में मल मिट्टी हो जाता था। वे जब अपनी मुट्ठी खोलते थे तो सहस्त्रों उपस्थिति भक्त वृन्द एक दिव्य गन्ध से मस्त हो जाते थे, उनके बाल नहीं बढ़ते थे, वे सोते नहीं थे, वस्त्र ओढ़ा दिया तो ओढ़ लिया नहीं तो उन्होंनें न कभी वस्त्र मांगे, न वस्त्र उपस्थित होने पर भी कभी स्वयं उपयोग किया। भक्त बहुत कीमती वस्त्र मुद्रा तथा अन्यायन्य बहुमूल्य वस्तुऐं भेट करते थे। आप उन अपित पदार्थों को देखते भी नहीं थे। हां! भक्त मनोरञ्जनार्थ कभी-कभी बालक के समान दस पन्द्रह मिनिटों तक उन वस्तुओं से खूब खेलते थे, फिर कुछ हो, कोई ले जाए, आप कोई प्रबन्ध नहीं करते थे। मिट्टी और बहुमूल्य पदार्थ सब समान ही थे। शत्रु मित्र, निन्दक प्रशसंक, पापी पुण्यात्मा, उनकी दयामयी दृष्टि में सब समान दया के अधिकारी थे। बहुरूपी श्री बाबाजी हमारे सामने सन्त रूप में प्रकट हुए। इन महावतारी श्री बाबाजी ने सद्गुरु बन भारत भूमि को सारे विश्व में धन्य-धन्य किया, विशेष कर कूर्माञ्चल खण्ड को गौरवान्वित किया:- 'दिव्य कथामृत' में लिखा है :- 'अहो धन्य कूर्माञ्चल वासी। पाये तुम शिव सन्त उदासी।'

आपकी महिमा गान में जब शेष एवं श्रुतियाँ असमर्थ हो जाती हैं तो मै क्षुद्र 'चरणाश्रित' क्या लिख सकता हूँ। ''जोसि सोसि तव चरणनमामि'' जो भी है आप मेरे अराध्य, परम देव हैं। जगदोद्धारक परम कारुणिक महामहिमा सम्पन्न बाबा भगवान सद्गुरु रुप में विचरते हैं। इनके मानव एवं कारुण्यपूर्ण प्राकट्य ने सरस दयामय स्वरूप धारण किया है, शरणागत वत्सल तथा पतितोद्धारक त्र्यम्बक बाबा ने अपने ही अभिन्न अंग श्री सद्गुरु माला की एक उज्ज्वल मणिका के रूप में जड़ान्ध व्यास विश्व को नव चैतन्यालोक सच्चिदानन्द प्रासि का सरलतम साधनप्रदान किया है। उन के विषय में आज अनन्त कण्ठ की यही ध्वनि है कि:-श्रीसद्गुरुदेव जी महाराज ऐसे दयामय देव हैं, जिनके चरण की शरण लेने पर सम्पूर्ण जीवन यात्रा ही सुख पूर्वक सफल हो जाती है। अभी तक जितने भी श्रद्धालु श्री महाराज जी के शरणागत जीव मिले सब सुखी व शान्त देखे गये हैं। लोक प्रसिद्ध एकान्तवासी मुनि, प्रकृति निर्मित गिरि कन्दरा को ही अपना आवास मानने वाले तपस्वी, पृथ्वी माता के दिये हुये अयाचित कन्द मूलादि से ही जीवन निर्वाह करने वाले महाप्रसिद्ध ओजस्वी ब्रह्मचारी, जिनकी चरणधूलि धारण मात्र से ही त्रिविध ऐषणा लौकिक परलौकिक समस्त वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं, ऐसे हमारे पतित पावन, मनस्वी मेधावी, देशकाल से सर्वथा परे, पंच कोष एवं सस चक्र के विज्ञान तथा उत्थापन जिनकी कृपा से अनायास ही हो जाता है, वे ही प्रसिद्ध श्री सद्गुरु माला के परमोज्वल सुमेरु मणिका हैं:- श्री हैडियाखण्ड वाले बाबा –

ईश रूप गुरु रूप ईश हैं।एक तत्व पर नाम भिन्न हैं॥

श्रीचरणाश्रित श्रीसदाशिवकुंज ब्रह्मकुण्ड, वृन्दावन (मथुरा)

भगवान् श्री हैड़ियाखण्डी बाबाजी
भगवान् श्री हैड़ियाखण्डी बाबाजी